Wednesday, March 2, 2011

ईमानदारी और हमारे संस्कार

हमलोग हमेशा अपने राजनेताओं को कोसते हैं उनके भ्रष्टाचार को लेकर। सही है कोसना भी चाहिए, क्योकि वो हैं उस लायक। पर क्या कभी हमने खुद के बारे में कभी सोचा है की हम ईमानदार क्यों हैं और कब तक हैं? तभी तक जब तक हमें मौका नहीं मिलता। बहुत से लोगो से ये बात पूछी जाये की आप अपने ज़िन्दगी में कितना इमानदार हैं तो सबका जवाब आएगा की हम तो भाई बहुत इमानदार हैं। लोग झूठ बोलने में बिलकुल नहीं हिचकिचाएंगे। ऐसे झूठ बोलेंगे जैसे इसी के लिए उनका अवतार हुआ हो। पर कहते हैं इन्सान पूरी दुनिया से झूठ बोल सकता है पर खुद से नहीं। जरुरत है की खुद सोचा जाये की हम कितने इमानदार हैं अपने प्रति, अपने परिवार के प्रति, अपने देश के प्रति, अपने समाज के प्रति? अगर खुद से पूछे तो समझ आएगा की हम कितने पानी में हैं। जरुरत इस बात की नहीं है की हम विवाद करे की किसने देश के लिए क्या किया? जरुरत इस बात की है की जो मई कर सकता था आसानी से वो मैंने किया या नहीं? हमारे बापू ने कहा कि "बुरा मत देखो, बुरा मत सोचो, और बुरा मत बोलो" लोगो ने ये तो मन नहीं और आगे ही बढ़ गए। वो तो डायरेक्ट बुरा करने लगे। मै ये नहीं कहता कि मै बहुत ईमानदार हु, पर मुझे होना चाहिए। और पूरी कोशिस करनी चाहिए कि अपनी ईमानदारी बनाये रखे। हमारे संस्कार हमें ईमानदारी सिखाते हैं पर आज हम संस्कार ही नहीं सीखना चाहते। हमें लगता है कि जो संस्कार कि बाते करता है वो तो "out dated" है। माता पिता जो सिखाते हैं वो गलत है और जो हम जानते हैं वही सही है। और हम ये जानते हैं कि किसी तरह लोगो को उल्लू बना कर अपना उल्लू सीधा करो। अगर हमें इमानदार बनकर दिल से खुश रहना है तो अपने पुराने संस्कारो कि तरफ लौटना होगा। क्योकि जब तक अपने जीवन में संतुष्टि नहीं होगी तब तक हम खुश नहीं रह सकते और वो संतुष्टि तभी आएगी जब हम खुद से सच बोले। खुद के दिल कि सच्चाई को बार बार दबाने से एक घुटन होती है जो कि सिर्फ वही महसूस करता है जो खुद से झूठ बोलने कि कोशिस करता है। मै यहाँ खुद से झूठ बोलने कि कोशिस इसलिए बोल रहा हूँ क्योकि खुद से झूठ बोला नहीं जा सकता कोशिस ही कि जा सकती है। आप बेईमानी से घर भर कर ऊपर से भले ही खुश दिखे पर जरुर आपके अन्दर एक घुटन होगी जो चमचमाती कार और चमचमाते घर की ख़ुशी से कही ज्यादा प्रभावी होगी। सोचना आपको है कि आप इमानदारी से रहकर बहार और अन्दर दोनों कि ख़ुशी लेना चाहते हैं या बेईमानी से कमाकर सिर्फ बहार कि ख़ुशी। वो भी सिर्फ दिखने के लिए। मै ये नहीं कह रहा की बिलकुल पुरातन पंथी हो जाओ पर पुराणी जो अच्छी बाते हैं कम से कम उन्हें तो अपनाना ही होगा।
फैसला आपका।