Saturday, January 8, 2011

आज की युवा पीढ़ी


मैं अक्सर ये सुनता हूँ कि आजकल के युवाओं में वो बात नहीं है जो पहले के लोगो में थी। पहले के लोग बड़ो कि इज्जत करते थे और अपनी परम्पराओ का बहुत अच्छी तरह से पालन करते थे। मतलब पहले के लोग संस्कारी होते थे। पहले लोग बड़ी बड़ी कुर्बानियाँ देते थे। अपनी ख़ुशी से बढ़कर उनके लिए दुसरो कि ख़ुशी थी। क्या वाकई ऐसा है? क्या हमलोग अपने संस्कार भूल गए हैं? मुझे ऐसा नहीं लगता। हाँ आजकल के लोगो और पहले के लोगो में अंतर जरुर है पर इसका ये मतलब नहीं कि हमलोग सब कुछ भूल गए हैं। हमारे सोच अलग हो गए हैं, संस्कार के मतलब बदल गए हैं। हमलोग बांध कर नहीं रहना चाहते हैं, इसी को कुछ लोग संस्कार में हुई कमी कहते हैं। पुराने लोगो के लिए सिर्फ परम्पराए ही सबकुछ थी जिन्हें वो ब्रह्मा कि लकीर समझते थे। उसमे कोई उलटफेर पसंद नहीं करते थे। उन्हें इस से मतलब नहीं था कि ये गलत है या सही? ये तार्किक है या नहीं? उन्हें बस इस से मतलब था कि हमारे पूर्वज इसे बना कर गए हैं मतलब ये किसी तरह सही ही होगा। पर आज लोग इसे चुनौती देते हैं। हम बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही है। हमें समझ आता है क्योकि हम समझना चाहते हैं। हम बंद आँखों से किसी भी बात पर भरोसा नहीं करते। किसी भी बात पर भरोसा करने से पहले हम उसे तर्क कि कसौटी पर कसते हैं और अगर हमारे ही किसी दोस्त ने उसपर भरोसा नहीं किया तो हम ये उसकी निजी राय है कहकर छोड़ देते हैं। हम उसके खिलाफ कोई फतवा नहीं जारी करते। हमारी शिक्षा का स्तर इतना बढ़ गया है कि हम क्या सही है और क्या गलत हम समझ सकते हैं। पहले भी लोगो में ये समझ थी पर वो समझना नहीं चाहते थे क्योकि इसे वो पाप समझते थे। पहले लोगो कि ज़िन्दगी में उतनी चुनौतिया नहीं थी पग पग पर जितनी आज के लोगो कि ज़िन्दगी में है। क्योकि पहले लोग पारंपरिक तरीको से जीते थे। वो कोई बदलाव नहीं चाहते थे। वो जैसे थे उसी में पूरी तरह से संतुष्ट थे। आज हम वही करना चाहते हैं जो हमें अच्छा लगे। हम कुछ भी मज़बूरी में नहीं करना चाहते हैं। एक दिन मेरी बात मेरे एक दोस्त से हो रही थी। बात शादी तक आ गयी। उसने मुझे पूछा कि शादी का क्या प्लान है? मैंने जवाब दिया कि बस यार एक अच्छी लड़की कि तलाश है, मिल जाये शादी कर लूँ। उस से भी मैंने यही सवाल किया। उसका जवाब बहुत ही रोचक और संस्कारी था। उसने कहा कि यार मेरे पास तो लड़की है पर मै सही समय कि तलाश में हूँ। इसका ये मतलब था कि हमलोग जो भी बदलाव चाहते हैं उसमे बड़ो कि ख़ुशी भी चाहते हैं, वरना आज हमलोगों में इतनी ताकत तो है कि जो अच्छा लगे वो करे पर हमारे संस्कार ही हमें बिना बड़ो कि ख़ुशी को शामिल किये ये करने से रोकते हैं। चेतन भगत ने अपनी उपन्यास टू स्टेट्स में लिखा है कि "its easy to rebel but hard to convince" और हमलोग आसन रश्ते को नहीं चुनकर कठिन रश्ते को चुनते हैं। हम कन्विंस करते हैं क्योकि हमारे लिए उनकी ख़ुशी मायने रखती है। किसी को ये नहीं पता है कि हमें उस दौरान कितनी तकलीफ होती है जब हम बड़ो कि ख़ुशी के लिए अपने सपनो को तोड़ते हैं या पोस्टपोन करते हैं? पर हम करते हैं क्योकि जिन्होंने हमारे लिए अपने सपने कुर्बान किये उनकी ख़ुशी का हमें अंदाजा है। हम आज ये चाहते हैं कि उनके साथ हम भी खुश रहें। आज के युवा दोराहे पर है, उसे समझ नहीं आता कि क्या करे? एक तरफ उसके अपने सपने हैं जो किसी भी कीमत पर वो पूरा करना चाहता है तो दूसरी तरफ किसी और कि उम्मीद जो उस से पल कर बैठा है। उसकी उम्मीद जिसने कि उसे इस लायक बनाने के लिए कि वो इतना सोच सके, अपने सरे सपनो को कुर्बान कर दिया है। इसीलिए आजकल लोग उन्हें हमेशा खुश देखना चाहते हैं। कई सरे लड़के अपने सपनो को, अपनी खुशियों को अपने माँ बाप के लिए कुर्बान कर देते हैं। ये अलग बात है कि माँ, बाप अपनी खुशियों को अपने बेटे बेटियों के लिए ज्यादा कुर्बान करते हैं। इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि आज के युवा संस्कार भूल गए हैं। आजकल के युवा अपने सपनो को भी उतने ही महत्वपूर्ण मानते हैं जितना उनके लिए संस्कार हैं। उन्हें नहीं भरोसा है कि पिछले जन्म और अगले जन्म का कोई फंडा है। उन्हें लगता है कि जो है बस यही है। अच्छी तरह से मस्ती करो, खुश रहो। क्या पता "कल हो न हो"।

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