Friday, October 7, 2011

बाल ठाकरे और अन्ना हजारे


आजकल बाल ठाकरे और अन्ना हजारे की बातो पर फेसबुक पर बहस चल रही है बाल ठाकरे ने बोला है की अन्ना हजारे का अनसन फाइव स्टार अनसन था और अनसन से देश का भ्रस्टाचार दूर नहीं होगा फिर बाल ठाकरे ही बताये की भ्रष्टाचार दूर कैसे होगा मै समझता हूँ की बाल ठाकरे को तो बोलने का अधिकार ही नहीं है देश के विकास की बातो में देश को लुट लुट कर, बाँट बाँट कर, कभी धरम के नाम पर तो कभी क्षेत्र के नाम पर, खोखला कर दिया है बाल ठाकरे की वो औकात नहीं है की देश के बारे में कुछ बोले उसके खानदान ने पुरे महाराष्ट्र को लुटा और अब पुरे देश को लूटना चाहते हैं खुद को हिन्दू ह्रदय सम्राट बोलता है और मराठियों के अलावा किसी और के विकास से उसे मतलब ही नहीं है क्या महाराष्ट्र के बहार हिन्दू नहीं रहते? मुंबई को अपनी जागीर समझता है, अभी तक किसी सर्कार ने उसे सबक नहीं सिखाया इस वजह से उसका मन बाधा हुआ है वो ये नहीं समझता की मुंबई के विकास में मराठियों से ज्यादा पुरे देश के लोगो का हाथ है बोलता है की अमिताभ बच्चन को लोग मुंबई की वजह से जानते हैं, मुंबई ने उन्हें सबकुछ दिया है उसे ये नहीं पता है की बहुत लोग मुंबई को फिल्म नगरी के कारन जानते हैं मुंबई को अमिताभ बच्चन ने बहुत कुछ दिया है मरण के कगार पर बैठकर भी उसे इतनी समझ नहीं है की प्यार से मरे दिल में नफरत लेकर ही मरेगा बोलता किसके बारे में है, तो अन्ना के बारे में एक वो जो हमेशा देश को लूटकर घर भरने के चक्कर में लगा रहता है और दुसरे अन्ना जो की देश के लिए अनशन पर बैठता है मानते हैं अन्ना में गाँधी होने वाली बात नहीं है पर जो किया वो देश की भलाई के लिए ही तो था मै बस यही कहना चाहता हूँ कि बाल ठाकरे किसी को कुछ बोलने से पहले अपनी औकात देख लिया करे

Wednesday, September 28, 2011

हमारे देश का दोहरा लोकतंत्र


अभी दुर्गापूजा का समय है। सभी इसकी तयारी में लगे हैं। हर जगह पूजा पंडाल बनाये जा रहे हैं। न्यायलय ने कहा है कि कोई भी पूजा पंडाल किसी पार्क में नहीं होना चाहिए। सही है, किसी पार्क में पंडाल नहीं बनना चाहिए, इस से समस्या आती है। पर काश हमारी अदालत को वो हर शुक्रवार को नमाज के कारन होने वाले सड़क जाम पर भी जाता कि इस से लोगो को कितनी परेशानी होती है। जिस सड़क के किनारे कोई मस्जिद हो दिल्ली में वो सड़क हर शुक्रवार को नमाज के समय बंद हो जाता है ताकि नमाजियों को कोई तकलीफ न हो, पर जो रोज आने जाने वाले लोग हैं वो परेशान हो। हर शुक्रवार को कोई सड़क पर नमाज पढ़ सकता है पर नौ दिनों के लिए पार्क में पंडाल नहीं बन सकता। मै पार्क में पंडाल बनाने के पक्ष में नहीं हूँ पर हर शुक्रवार को जाम होने वाले सड़क के बारे में भी कुछ किया जाये तो अच्छा होगा। मुझे लगता है इस से लोगो को ज्यादा परेशानी होती है। ये हमारे देश का ट्रेंड है कि जब भी मुस्लिम कट्टरपंथी कि बात आती है साथ में हिन्दू कट्टरपंथी कि बात भी जोड़ दी जाती है ये दिखने के लिए कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं। जबकि सबको ये पता है कि आम हिन्दू उतना कट्टर नहीं होता जितना एक आम मुसलमान। एक हिन्दू जो किसी कट्टरवादी संगठन से जुदा है वही कट्टर होता है पर मुस्लिम सारे होते हैं। जिस दिन सारे हिन्दू कट्टर हो जाये उस दिन देश में लोकतंत्र नहीं रह पायेगा और देश नरक बन जायेगा पर कुछ हिन्दुओ को कट्टर होना जरुरी है वरना देश इस तुष्टीकरण कि भेंट चढ़ जायेगा और बन जायेगा हमारा देश भी एक दूसरा पाकिस्तान।
हमारे देश का लोकतंत्र अलग है, पूरी दुनिया में अल्पसंख्यको से भेदभाव किया जाता है और बहुसंख्यको को ज्यादा सुविधाए दी जाती है, पर हमारे देश में उल्टा है। यहाँ अल्पसंख्यक ही शेर हैं। हिन्दुओ को ही दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाता है। इसलिए मुठ्ठी भर हिन्दू कट्टरपंथियों का होना जरुरी है वरना हमें जीने नहीं दिया जायेगा। मै नहीं चाहता ही कि हमें कुछ ज्यादा पॉवर दिया जाये पर बराबर तो चाहता ही हूँ। यहाँ के मुसलमान वन्दे मातरम नहीं गा सकते जिसे गा गा कर क्रांतिकारियों ने देश आज़ाद कराया। ये हमारे देश का दुर्भाग्य है।
जय हिंद। जय भारत। वन्दे मातरम।

Wednesday, March 2, 2011

ईमानदारी और हमारे संस्कार

हमलोग हमेशा अपने राजनेताओं को कोसते हैं उनके भ्रष्टाचार को लेकर। सही है कोसना भी चाहिए, क्योकि वो हैं उस लायक। पर क्या कभी हमने खुद के बारे में कभी सोचा है की हम ईमानदार क्यों हैं और कब तक हैं? तभी तक जब तक हमें मौका नहीं मिलता। बहुत से लोगो से ये बात पूछी जाये की आप अपने ज़िन्दगी में कितना इमानदार हैं तो सबका जवाब आएगा की हम तो भाई बहुत इमानदार हैं। लोग झूठ बोलने में बिलकुल नहीं हिचकिचाएंगे। ऐसे झूठ बोलेंगे जैसे इसी के लिए उनका अवतार हुआ हो। पर कहते हैं इन्सान पूरी दुनिया से झूठ बोल सकता है पर खुद से नहीं। जरुरत है की खुद सोचा जाये की हम कितने इमानदार हैं अपने प्रति, अपने परिवार के प्रति, अपने देश के प्रति, अपने समाज के प्रति? अगर खुद से पूछे तो समझ आएगा की हम कितने पानी में हैं। जरुरत इस बात की नहीं है की हम विवाद करे की किसने देश के लिए क्या किया? जरुरत इस बात की है की जो मई कर सकता था आसानी से वो मैंने किया या नहीं? हमारे बापू ने कहा कि "बुरा मत देखो, बुरा मत सोचो, और बुरा मत बोलो" लोगो ने ये तो मन नहीं और आगे ही बढ़ गए। वो तो डायरेक्ट बुरा करने लगे। मै ये नहीं कहता कि मै बहुत ईमानदार हु, पर मुझे होना चाहिए। और पूरी कोशिस करनी चाहिए कि अपनी ईमानदारी बनाये रखे। हमारे संस्कार हमें ईमानदारी सिखाते हैं पर आज हम संस्कार ही नहीं सीखना चाहते। हमें लगता है कि जो संस्कार कि बाते करता है वो तो "out dated" है। माता पिता जो सिखाते हैं वो गलत है और जो हम जानते हैं वही सही है। और हम ये जानते हैं कि किसी तरह लोगो को उल्लू बना कर अपना उल्लू सीधा करो। अगर हमें इमानदार बनकर दिल से खुश रहना है तो अपने पुराने संस्कारो कि तरफ लौटना होगा। क्योकि जब तक अपने जीवन में संतुष्टि नहीं होगी तब तक हम खुश नहीं रह सकते और वो संतुष्टि तभी आएगी जब हम खुद से सच बोले। खुद के दिल कि सच्चाई को बार बार दबाने से एक घुटन होती है जो कि सिर्फ वही महसूस करता है जो खुद से झूठ बोलने कि कोशिस करता है। मै यहाँ खुद से झूठ बोलने कि कोशिस इसलिए बोल रहा हूँ क्योकि खुद से झूठ बोला नहीं जा सकता कोशिस ही कि जा सकती है। आप बेईमानी से घर भर कर ऊपर से भले ही खुश दिखे पर जरुर आपके अन्दर एक घुटन होगी जो चमचमाती कार और चमचमाते घर की ख़ुशी से कही ज्यादा प्रभावी होगी। सोचना आपको है कि आप इमानदारी से रहकर बहार और अन्दर दोनों कि ख़ुशी लेना चाहते हैं या बेईमानी से कमाकर सिर्फ बहार कि ख़ुशी। वो भी सिर्फ दिखने के लिए। मै ये नहीं कह रहा की बिलकुल पुरातन पंथी हो जाओ पर पुराणी जो अच्छी बाते हैं कम से कम उन्हें तो अपनाना ही होगा।
फैसला आपका।

Saturday, January 8, 2011

आज की युवा पीढ़ी


मैं अक्सर ये सुनता हूँ कि आजकल के युवाओं में वो बात नहीं है जो पहले के लोगो में थी। पहले के लोग बड़ो कि इज्जत करते थे और अपनी परम्पराओ का बहुत अच्छी तरह से पालन करते थे। मतलब पहले के लोग संस्कारी होते थे। पहले लोग बड़ी बड़ी कुर्बानियाँ देते थे। अपनी ख़ुशी से बढ़कर उनके लिए दुसरो कि ख़ुशी थी। क्या वाकई ऐसा है? क्या हमलोग अपने संस्कार भूल गए हैं? मुझे ऐसा नहीं लगता। हाँ आजकल के लोगो और पहले के लोगो में अंतर जरुर है पर इसका ये मतलब नहीं कि हमलोग सब कुछ भूल गए हैं। हमारे सोच अलग हो गए हैं, संस्कार के मतलब बदल गए हैं। हमलोग बांध कर नहीं रहना चाहते हैं, इसी को कुछ लोग संस्कार में हुई कमी कहते हैं। पुराने लोगो के लिए सिर्फ परम्पराए ही सबकुछ थी जिन्हें वो ब्रह्मा कि लकीर समझते थे। उसमे कोई उलटफेर पसंद नहीं करते थे। उन्हें इस से मतलब नहीं था कि ये गलत है या सही? ये तार्किक है या नहीं? उन्हें बस इस से मतलब था कि हमारे पूर्वज इसे बना कर गए हैं मतलब ये किसी तरह सही ही होगा। पर आज लोग इसे चुनौती देते हैं। हम बताते हैं कि क्या गलत है और क्या सही है। हमें समझ आता है क्योकि हम समझना चाहते हैं। हम बंद आँखों से किसी भी बात पर भरोसा नहीं करते। किसी भी बात पर भरोसा करने से पहले हम उसे तर्क कि कसौटी पर कसते हैं और अगर हमारे ही किसी दोस्त ने उसपर भरोसा नहीं किया तो हम ये उसकी निजी राय है कहकर छोड़ देते हैं। हम उसके खिलाफ कोई फतवा नहीं जारी करते। हमारी शिक्षा का स्तर इतना बढ़ गया है कि हम क्या सही है और क्या गलत हम समझ सकते हैं। पहले भी लोगो में ये समझ थी पर वो समझना नहीं चाहते थे क्योकि इसे वो पाप समझते थे। पहले लोगो कि ज़िन्दगी में उतनी चुनौतिया नहीं थी पग पग पर जितनी आज के लोगो कि ज़िन्दगी में है। क्योकि पहले लोग पारंपरिक तरीको से जीते थे। वो कोई बदलाव नहीं चाहते थे। वो जैसे थे उसी में पूरी तरह से संतुष्ट थे। आज हम वही करना चाहते हैं जो हमें अच्छा लगे। हम कुछ भी मज़बूरी में नहीं करना चाहते हैं। एक दिन मेरी बात मेरे एक दोस्त से हो रही थी। बात शादी तक आ गयी। उसने मुझे पूछा कि शादी का क्या प्लान है? मैंने जवाब दिया कि बस यार एक अच्छी लड़की कि तलाश है, मिल जाये शादी कर लूँ। उस से भी मैंने यही सवाल किया। उसका जवाब बहुत ही रोचक और संस्कारी था। उसने कहा कि यार मेरे पास तो लड़की है पर मै सही समय कि तलाश में हूँ। इसका ये मतलब था कि हमलोग जो भी बदलाव चाहते हैं उसमे बड़ो कि ख़ुशी भी चाहते हैं, वरना आज हमलोगों में इतनी ताकत तो है कि जो अच्छा लगे वो करे पर हमारे संस्कार ही हमें बिना बड़ो कि ख़ुशी को शामिल किये ये करने से रोकते हैं। चेतन भगत ने अपनी उपन्यास टू स्टेट्स में लिखा है कि "its easy to rebel but hard to convince" और हमलोग आसन रश्ते को नहीं चुनकर कठिन रश्ते को चुनते हैं। हम कन्विंस करते हैं क्योकि हमारे लिए उनकी ख़ुशी मायने रखती है। किसी को ये नहीं पता है कि हमें उस दौरान कितनी तकलीफ होती है जब हम बड़ो कि ख़ुशी के लिए अपने सपनो को तोड़ते हैं या पोस्टपोन करते हैं? पर हम करते हैं क्योकि जिन्होंने हमारे लिए अपने सपने कुर्बान किये उनकी ख़ुशी का हमें अंदाजा है। हम आज ये चाहते हैं कि उनके साथ हम भी खुश रहें। आज के युवा दोराहे पर है, उसे समझ नहीं आता कि क्या करे? एक तरफ उसके अपने सपने हैं जो किसी भी कीमत पर वो पूरा करना चाहता है तो दूसरी तरफ किसी और कि उम्मीद जो उस से पल कर बैठा है। उसकी उम्मीद जिसने कि उसे इस लायक बनाने के लिए कि वो इतना सोच सके, अपने सरे सपनो को कुर्बान कर दिया है। इसीलिए आजकल लोग उन्हें हमेशा खुश देखना चाहते हैं। कई सरे लड़के अपने सपनो को, अपनी खुशियों को अपने माँ बाप के लिए कुर्बान कर देते हैं। ये अलग बात है कि माँ, बाप अपनी खुशियों को अपने बेटे बेटियों के लिए ज्यादा कुर्बान करते हैं। इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि आज के युवा संस्कार भूल गए हैं। आजकल के युवा अपने सपनो को भी उतने ही महत्वपूर्ण मानते हैं जितना उनके लिए संस्कार हैं। उन्हें नहीं भरोसा है कि पिछले जन्म और अगले जन्म का कोई फंडा है। उन्हें लगता है कि जो है बस यही है। अच्छी तरह से मस्ती करो, खुश रहो। क्या पता "कल हो न हो"।