Saturday, July 31, 2010

फ्रेंडशिप डे

फ्रेंडशिप डे। एक ऐसा दिन जो दोस्तों के लिए बना है। सबके दोस्त होते हैं ज़िन्दगी में और रोज बनते हैं। उनके लिए एक दिन बनाया गया है ताकि इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में एक दिन तो ऐसा हो जिसमे हम अपने दोस्तों को याद करे और उन्हें शुभकामनाये दे। इस दिन की सुरुआत हुई थी १९३५ में अमेरिका से। उस दिन अमेरिकी सरकार ने एक व्यक्ति को मार दिया था और उसकी याद में और गम में उसके एक दोस्त ने आत्महत्या कर लिया। उसी दिन से सरकार ने हर साल के अगस्त के पहले रविवार को फ्रेंडशिप डे मनाने का निर्णय लिया। तब से हम ये दिन अपने दोस्तों के लिए ही मनाते हैं। हम सभी जानते हैं की हमारे जीवन में दोस्तों का कितना महत्व है? बिना दोस्तों के हम एक कदम नहीं चल सकते। दोस्ती रिश्तो की मोहताज नहीं होती। किसी भी रिश्ते में दोस्ती हो सकती है और बिना किसी रिश्ते के भी। रिश्ता तो फिर भी हम अपनी मर्जी से नहीं चुन पाते पर दोस्त तो सुद्ध रूप से हम अपने मर्जी से ही चुनते हैं। दोस्त चाहे बाप बेटे, माँ बेटे, पति पत्नी या भाई बहन कोई भी हो सकता है। और दोस्ती से बढ़कर कोई रिश्ता नहीं होता तभी कहा गया है की हर रिश्ते में एक दोस्त खोजना चाहिए। लोग अक्सर कहते हैं मई इसका बाप कम दोस्त ज्यादा हु। भाई कम दोस्त ज्यादा हु। कभी किसी ने ये नहीं कहा की मई दोस्त कम बाप ज्यादा हु या दोस्त कम भाई ज्यादा हु। क्योकि दोस्त वो होता है जिस से हम अपनी साड़ी बाते बताते हैं। हम अपने भाई, पिता, बहन से वो बाते नहीं बता सकते जो की एक दोस्त से। और वो दोस्त उसका हल भी देता है। फ्रेंडशिप डे मना लेने भर से हमारी दोस्ती का कर्त्तव्य पूरा नहीं हो जाता, इसके लिए हमें सच्ची दोस्ती निभानी भी पड़ती है। कई लोग उन्हें भी विश करते हैं जो उनके दोस्त नहीं होते क्योकि नए दोस्त भी बनते हैं रोज रोज। हैप्पी फ्रेंडशिप डे।

राहुल महाजन और डिम्पी का नाटक



ये क्या नाटक है यार? राहुल महाजन और डिम्पी गांगुली। पहले मारपीट को लेकर मीडिया के पास पहुची उअर जब मीडिया ने उनकी बात लोगो के सामने रखा तो उन्होंने मीडिया को नसीहत दी की मेरी निजता को रेस्पेक्ट करे। नाटक ही है की जिसपर अपनी पहली पत्नी जो बचपन की दोस्त थी से मारपीट के बाद तलक हुआ था, ये जानते हुए भी उस से शादी करना उर फिर मारपीट का आरोप लगाकर घर छोड़ देना, फिर घर वापस आकर मीडिया को नसीहत देना। मीडिया की वजह से ही तो वो आज अपनी बात सबके सामने रखवा सकी। मीडिया ने ही सबको बताया की राहुल ने उनसे मारपीट की है तब राहुल ने माफ़ी मांगी और उन्हें घर लाया। फिर मीडिया को ही नसीहत? सच है नेकी कर जूता खा। मीडिया ने नेकी किया और आज जूता भी खा रहा है। जब उन्हें साड़ी बाते पता थी की राहुल जी दृग्स के आदि हैं और अपनी पहली पत्नी से मारपीट कर चुके हैं फिर भी शादी की। फिर ये तो होना ही था। कहा जाता है की इन्सान का नेचर और सिग्नेचर कभी नहीं बदलता। और राहुल भी इन्सान है यार। पर लोग फेम के लिए कुछ भी कर सकते हैं और डिम्पी गांगुली ने ये साबित कर दिया है राहुल से शादी कर के। कोई बात नहीं आप लगे रहिये राहुल जी कभी कभी सुधर ही जायेंगे। all the best dimpy ji.

देशभक्ति और घोटाला

इ क्या कोई ऐसा प्रोजेक्ट है देश में आजतक जो बिना किसी घोटाले के पूरा हुआ हो? प्लीज मेरी मदद करे मै जानने के लिए बेताब हु। मुझे दिख नहीं रहा है। राष्ट्रमंडल खेल जिस से हमारे देश की इज्जत जुडी हुई है वो घोटाले से अछूता नहीं रहा। सो प्लीज मेरी मदद करे और मुझे बताये जैसे ही आपको पता चले। देश में सड़क बनाने में , बिजली देने में , शिक्षा के क्षेत्र में या कहे की हर क्षेत्र में घोटाले हुए हैं पर आज तो इज्जत में भी घोटाला हो गया। और ये भी पता है की जो लोग इसके जिम्मेदार हैं उन्हका कुछ उखाड़ने वाला भी नहीं है। अगर आप ये सोच रहे हो की ये घोटाला सामने आ गया है और जिम्मेदार लोग सलाखों के पीछे जायेंगे तो ये ग़लतफ़हमी अपने दिल से बिलकुल निकाल दीजिये। क्योकि ग़लतफ़हमी से आजतक नुक्सान ही हुआ है कभी भला नहीं हुआ है। आपको नहीं लगता की जो ये घोटाले कर सकते हैं वो खुद को बचा भी सकते हैं। इंडिया है भाई कोई अमेरिका थोड़े ही है। आई पी एल में शरद पवार की कोई हिस्सेदारी नहीं थी फिर भी मीडिया ने उन्हें फसाया। मीडिया ने उस बात को उजागर कर दिया जो की वो छुपाना चाहते थे। सोलह प्रतिशत ही तो हिस्सेदारी थी उनकी, ये कौन सी बड़ी बात थी। छोटे छोटे लोग इतने बड़े घोटाले करते हैं और वो तो बहुत बड़े मंत्री और राजनेता थे। उनका हक़ बनता है या नहीं कुछ देश को लुटने का। थोड़ी सी देश को लुट क्या लिया इन लोगो ने मीडिया की आँख में खटक गए। सबको कमाने का अधिकार है यार, चाहे वो देश को लूटकर कमाए या किसी तरह से। हमारे संविधान ने भी तो कहा है किसी को भी कही भी कमाने का अधिकार है। राष्ट्रमंडल खेल के घोटाले में सी बी आई जो की सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इंवेस्टिगेसन की जगह कांग्रेस ब्यूरो ऑफ़ इंवेस्टिगेसन की तरह काम कर रही है वो कुछ नहीं करेगी। वो तो गुजरात के पीछे पड़ी है। १९८४ के दंगो के आरोपी जगदीश तैत्लर जिन्हें की हर गवाहों ने पहचान किया अदालत में उन्हें हमेशा क्लीन चित मिल जाती है पर गुजरात में फसाया जा रहा है। क्या करे कांग्रेस अपनी परंपरा तो नहीं छोड़ सकती न सरकारी विभगो के दुरुपयोग की। आजतक सत्ता में रही है और आज वो कैसे देख सकती है की कोई और मोदी टाइप aadmi गुजरात में तीन या चार बार मुख्यमंत्री बने। मज़बूरी है भाई कांग्रेस की भी। क्या करे? ये भी तो दिख रहा है की गुजरात ने इतनी तरक्की नहीं की थी कभी जितनी मोदी के राज में किया। इस से तो यही होगा न की मोदी फिर बनेंगे मुख्यमंत्री? ये कैसे बर्दास्त होगा कांग्रेस को। आपलोग समझते क्यों नहीं हैं की कांग्रेस सिर्फ दिखावे के लिए लोकतान्त्रिक पार्टी है असल में नहीं। उसके हर मंत्रालय तो निश्चित होते हैं। प्रधानमंत्री कैसे बनेगा, कौन बनेगा ये पहले से पता है। इसी लिए लोग थोड़ी चापलूसी भी कर देते हैं। कांग्रेस में लोग कभी प्रधान मंत्री बन्ने के लिए मेहनत नहीं करते क्योकि वो तो फिक्स है कौन बनेगा, हां कोई और मंत्री बनने के लिए मेहनत करते है ताकि लुट सके देश को। इसके लिए थोड़ी चापलूसी भी करनी पड़े तो क्या होता है यार? ये तो उनकी परंपरा है। इनकी कोई विचारधारा तो होती नहीं ऐसे ही देश सेवा का धंधा करने के लिए कूद गए हैं समर में। कौन कहता है लूटना देश सेवा नहीं है। पहले अंग्रेज लुटते थे तो धन देश के बाहर जाता था आज ये लुटते हैं तो धन कम से कम देश के अन्दर तो रहता है। बेकार आपलोग इनके पीछे पड़े हैं। देशभक्तों के पीछे सभी पड़ जाते हैं।

Wednesday, July 28, 2010

राष्ट्रमंडल खेल और हमारी तैयारियां




राष्ट्रमंडल खेलो के होने में अब मात्र दो महीने रह गए हैं और हमारी तैयारियों का असली पता तो दिल्ली की जनता को ही है। शर्म से सर झुक जाता है जब तैयारियों के बारे में सोचते हैं तो। तैयारी तो पूरी है नहीं और वाकयुद्ध चलना शुरू हो गया है। सरकार कहती है तैयारी पूरी है और विपक्ष कहता है पूरी नहीं है। पर जो भी हो, दिल्ली की जनता को भी नहीं लगता की तैयारी पूरी हो गयी है। कई सारे काम तो छोड़ दिए गए हैं सिर्फ इस वजह से की अब समय नहीं रहा। गन्दगी दिल्ली में वैसी ही पड़ी है। कोई भी काम ढंग से पूरा नहीं हुआ है। कुछ ही दिनों पहले “नवभारत टाइम्स ” में खबर आई थी की कहा कितना काम होना बाकी है? उसमे मैंने यही पढ़ा की कोई भी काम ऐसा नहीं है जिसमे थोड़ा काम बाकी ना हो। कई सारे काम तो ऐसे हैं जिनमे ९५% काम तक बाकी है। अब इस तैयारी पर हम सपना देख रहे हैं ओलंपिक कराने का। पहले ये तो ढंग से करा ले। मेट्रो में रोज कोई ना कोई समस्या लगी रहती है। उसे तो हम ढंग से चला नहीं पा रहे हैं और सपना देखते हैं बुल्लेट बुलेट ट्रेन चलाने का। वास्तव में सपने देखना कोई हम भारतीयो से सीखे। एक तरफ मणिशंकर अय्यर जो कई सारे कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं उनका बयान तो माशाल्लाह है. उन्होंने कहा है की “ मै खुश होऊंगा जब ये खेल पूरी तरह से असफल हो जायेंगे” क्या बात कहा है उन्होंने? देश की इज्जत चली जाएगी तो वो खुश होंगे। उनकी बात का क्या। उनपर तो एक रिपोर्ट आ चुकी है जब १९६२ में भारत और चीन लड़ रहे थे तो वो विदेशो में चीन के लिए फंड इकठ्ठा कर रहे थे। माना की तैयारी पूरी नहीं है, बहुत पैसे खर्च हो रहे हैं गेम्स के नाम पर, इस से हमारे देश की इज्जत जुडी हुई है। अगर हम इसमें असफल होते हैं तो लोग थूकेंगे हम पर और हमें तो वो सपना ही छोड़ देना होगा जिसमे हम ओलंपिक कराने का देखते हैं। ब्रिटेन की महारानी ने व्यस्त कार्यक्रमो का हवाला देते हुए खेल के उदघाटन समारोह में आने से मना कर दिया। इसपर कुछ लोगो ने इसकी वजह तैयारी पूरी नहीं होना बताया। उनका तर्क था की इस खेल सारे कार्यक्रम बारह साल पहले तय हो जाता है फिर उनका कार्यक्रम व्यस्त कैसे हो गया? उन्हें पता है की दिल्ली में तैयारी तो पूरी है नहीं इस वजह से नहीं आ रही है। हमारे हिसाब से यही बात है। हम तैयारी पूरी नहीं कर पाए हैं इस वजह से बहुत सारे स्टार खिलाडियो ने भी अपने हाथ खीच लिए हैं इस खेल से। हमारी दिल्ली में ४०० किलोमीटर प्रस्तावित थी मेट्रो लाइन पर अब तक २०० किलोमीटर भी नहीं बन पायी है. बाकी का काम खेलो के बाद किस गति से होगा ये आप अंदाजा लगा सकते हैं। जब जल्दीबाजी थी तब तो हुआ नहीं और जब कोई टोकने वाला नहीं होगा तब क्या करेगी सरकार? हां, मेट्रो पूरा तो होगा पर तब तक जब ये तकनीक पुरानी हो चुकी होगी और जापान चीन बुल्लेट से भी आगे जा चुके होंगे। भगवान् ही मालिक है हमारे राष्ट्रमंडल खेल का। अब तक कोई कैटरिंग सर्विस के लिए भी आगे नहीं आया। जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम बन कर तैयार है और अंतिम रूप देना बाकी है। ये अंतिम रूप देना क्यों बाकी है, इसे तो काफी पहले बन कर तैयार जाना चाहिए था जैसे चीन ने ओलंपिक के लिए बीजिंग को तैयार किया था. हमारे यहाँ तो स्टेडियम में एक तरफ खेल चलेंगे और दूसरी तरफ फिनिशिंग का काम होगा. सारे प्रोजेक्ट का तो यही हाल है।

Wednesday, July 21, 2010

जातिवाद

आज हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या जातिवाद और आपस में होने वाली भेदभाव है। सारी समस्याए चाहे वो भ्रष्टाचार हो, या भाई भतीजावाद हमारे जातिवाद से निकली है। आज हम सिर्फ और सिर्फ भारतीय होते तो हमारी बहुत सारी समस्याए नहीं होती अस्तित्व में। जातिवाद तो काफी पुराना है पर आज के जमाने में भी, जब दुनिया चाँद पर पहुचने की कोसिस कर रही है और हम जातिवाद में फसे हैं, की हम ब्रह्मिन हैं वो दलित है आदि। प्राचीन काल में उची जातियों के लोग निम्न वर्ग के लोगो को दबाकर के रखते थे उनका विकाश नहीं होने देते थे पर आज तो उनके अपने जाति के लोग जो उनका मसीहा बनते हैं वही उनका विकाश नहीं होने देते , वही उनका विकाश रोक रखे हैं। उनका सिर्फ एक ही मकसद है की इन्हें उची जातियों से लड़ाते रहो और उनके बीच वैमनष्य फैला कर रखो ताकि चुनाव के समय उनका वोट मिल सके। उन्हें पता है की अगर जातिवाद ख़तम हुआ तो देश को तो फायदा होगा पर जो जाति के नाम पर राजनीति करते हैं उनको नुकसान होगा । क्योकि जब जाति ही नहीं रहेगी तो उनकी राजनीति कैसे चलेगी?जातिवाद मिटाने का सबसे कारगर उपाय है अंतरजातीय शादियों को बढ़ावा देना।
हमें जरुरत है एक ऐसे समाज की जिसमे कोई ऐसी बंदिश ना हो की हम ब्रह्मिन हैं और ये दलित है और हमारा रिश्ता इनसे नहीं हो सकता। यही भावना की हम बड़े हैं और वो छोटे हैं सारी समस्या की जड़ है। सरकार को चाहिए की लोगो के बीच अंतरजातीय शादी का क्रेज़ बढे। इसके लिए वो तरह तरह की योजनाये बना सकती है। जैसे वो अंतरजातीय शादी के प्रोत्साहन के लिए वो शादी करने वाले जोड़ो को कुछ पैसे दे सकती है। नौकरियों में आरक्षण दे सकती है। लोगो के बीच जागरुकता कार्यक्रम चला सकती है। इस से आज के आर्थिक युग में लोगो का रुझान अंतरजातीय शादियों के प्रति जरुर बढेगा। आज सबको पैसो की जरुरत है और जो प्यार में होते हैं किसी और जाति के लड़की या लडको के और समाज के डर से कदम पीछे खीच लेते हैं वो ऐसा नहीं करेंगे। हमारा मीडिया भी इस सम्बन्ध में कुछ जिम्मेदारी निभा सकता है। उसे भी एक जागरुकता कार्यक्रम शुरु करना चाहिए और समाज को बदलने की कोशिस करनी चाहिए। अभी कुछ दिनों पहले भारतीय क्रिकेट कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की शादी साक्षी सिंह रावत से हुई। इस खबर को सारे अखबारों ने प्रमुखता से छापा और इतनी कवरेज दी जैसे भारत ने कोई विश्व कप जीता हो। ये तो ठीक है पर उसमे एक खबर ऐसी थी जिसने समाजसेवियों का, जो की जाति मुक्त समाज चाहते हैं, दिल दुखाया होगा। वो ये था की “धोनी के गाँव वाले खुश हैं की धोनी ने अपनी जाति की लड़की से शादी की” इस से मेरे गाँव में भी बहस छिड़ गयी की धोनी को तो बहुत सारी लडकिया मिल सकती थी पर उसने अपने जाति की लड़की से शादी करके एक मिसाल कायम की है। इस खबर ने उन लोगो का हौसला बढाया जो दकियानूसी विचारधारा के हैं और अंतरजातीय शादियों को अपराध मानते हैं। ये धोनी का व्यक्तिगत मामला था की उन्होंने किस से शादी की पर ये खबर अखबार में नहीं आणि चाहिए थी जिसमे अपनी जाति में शादी करने को महिमामंडित किया गया हो। मीडिया को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। जब तक जातिवाद कायम है देश में देश तरक्की नहीं कर सकता और जातिवाद तब जाएगा जब लोगो की मानसिकता अंतरजातीय शादियों के प्रति बदलेगी। और वो तब होगा जब हमारी सरकार, मीडिया और गैर सरकारी संस्थान लोगो में जागरुकता फैलायेंगे। ये तब नहीं होगा जब अपनी जाति में हुई शादियों को महिमामंडित किया जाएगा.

Tuesday, July 20, 2010

sympathy is far better than gold

Sympathy is far better than gold. We have been hearing this sentence since our childhood. Everyone says this is right sentence even those who doesn’t know the meaning of sympathy. Most cruel person also say this. I know sympathy is tool to reduce one’s sorrow. If you help someone financially it is not better than sympathy. Where finance is needed sympathy can work but where sympathy needed money can’t work at all. Sympathy makes us strong. It is our power, and make us feel we are not alone. Someone is there to take care of mine. We can arrange money if we have some people who shows us sympathy with our sorrow. But some time extra sympathy make us week also. We try to forget our sorrow but sympathy given by other’s reminds us and sticks us to our sorrow. We start thinking oh my god, I am in trouble. Everybody is showing sympathy with me. I have some big problem, no matter the problem is very minor. It’s makes us mentally week.

भारतीय रेल



भारतीय रेल! आज लगता है की भारतीय रेल एक मजाक बन गया है। क्या सही है हमारी रेलवे में, ये ढूंढने पर भी पता नहीं चलता। आज हमें लगता है की हमारी सबसे बेकार सेवा जो है वो हमारी रेलवे है। वैसे तो कोई भी सरकारी संस्था सही काम नहीं कर रही है चाहे वो भारतीय रेल हो, भारतीय पोस्ट हो, भारतीय विमान सेवा हो। कल जो रेल दुर्घटना हुई है उसने तो मुझे रेल यात्रा करने से डराही दिया है। ऐसे तो यहाँ रेलवे भगवन भरोसे ही चलती है फिर भी ये दुर्घटनाएं तो आग में घी का काम करती हैं। अब तो पता ही नहीं चल रहा है की हम कैसे यात्रा करे? इस साल में पुरे एक दर्जन रेल हादसे हो चुके हैं पर किसी को इसमें अपनी गलती नहीं दिखाई देती है। न ही रेल मंत्री को और न ही हमारी सरकार को। इस देश का तो भगवान् ही मालिक है। पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले के सौन्थिया स्टेशन पर उत्तरबंग एक्सप्रेस जो अपने फुल स्पीड में थी, ने वनांचल एक्सप्रेस को जोरदार टक्कर मार दी जिसमे ६२ लोगो की मौत हो गयी और ९२ घायल हो गए। इनमे से ३६ की हालत गंभीर है। ये ६२ लोग तो गए। अब इनके जान की भरपाई क्या मुआवजा देकर किया जा सकता है? ये सच है की अब हमारे पास इनके लिए मुवावजा ही बचा है पर इनके जान की असली कीमत तो ये है की हम इन रेल हादसों को रोकने की कोसिस करे। पर ईमानदार कोसिस तो तब होगी जब किसी को अपनी गलती का एहसास होगा? आज हमारे पास एंटी कोलिसन डिवाइस नहीं है जिस से रेल की टक्कर रोकी जा सके। इस साल में रेल हादसों में हमारे देश में २५० न्लोग अपने जान से हाथ धो बैठे हैं। ये सरे हादसे हैं,

२१ अप्रैल 2009--- गोवा और मवाद एक्सप्रेस में टक्कर। २२ की मौत।

१ नवम्बर २००९--- मैसूर अजमेर एक्सप्रेस पटरी से उतरी।

१४ नवम्बर २००९---मन्दौर एक्सप्रेस पटरी से उतरी। ७ की मौत।

२ जनवरी २०१०--यु पी में तीन रेल हादसे एक ही दिन हुए। १५ की मौत।

३ जनवरी २०१०-- अरुणांचल एक्सप्रेस पटरी से उतरी।

१६ जनवरी २०१०-- कालिंदी और श्रमशक्ति टकराई। ३ की मौत।

२५ माय २०१०-- दिल्ली गुवाहाटी राजधानी पटरी से उतरी।

२८ मई २०१०-- ज्ञानेश्वरी पटरी से उतरी। १४८ की मौत।

१८ जून २०१०-- अमरावती एक्सप्रेस पटरी से उतरी।

और कल के हादसे को देखकर तो यही लगता है की भारतीय रेल हादसे के लिए ही बनी है। दुःख तो तब होता है जब ऐसे हादसे हो जाते हैं, लोग मार रहे होते हैं और उन्हें न्यायिक जाँच का आश्वाशन देकर आरोप प्रत्यारोप की राजनीती सुरु हो जाती है। किसी मंत्री को जिम्मेदारी लेते नहीं देखते हैं। कभी मंत्री ने नैतिक जिम्मेदारी लिया भी तो समझो इसमें उसकी कोई चाल है। कुछ ही दिनों पहले दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मची थी जिसमे कुछ लोगो की जान भी गयी थी। इसमें हमारे रेल मंत्री ने तो इस हादसे का जिम्मेदार जनता को ही ठहरा दिया। वो खुद कोल्कता में बैठकर रेल मंत्रालय संभल रही हैं तो ये तो होना ही है। हादसों को छोड़ भी दिया जाये तो आज हमारी भारतीय रेल सुरक्षित नहीं है। स्टेशन पर या रेल के अन्दर चोरिया, लूटपाट, हत्याए इस बात की गवाह है। किसी भी रेलवे स्टेशन पर या रेल के अन्दर आपको कोई भी चीज चाहे वो खाने की हो या किसी तरह की अधिकतम मूल्य से २ रुपये ज्यादा में ही मिलेगा। वेंडरो को किसी का भी दर नहीं है।mai एक बार banaaras स्टेशन पर था। मैंने पानी बोतल खरीदा जो की मुझे १० रुपये का मिलना चाहिए था वो मुझे मिला १५ रुपये का। मैंने उस से पूछा की क्यों भाई अधिकतम मूल्य तो १० रुपये ही है। तुम १५ क्यों ले रहे हो? उसने कहा की यहाँ यही लगता है। मैंने कहा अजीब हल है यार तुमलोगों को कोई बोलता नहीं है कुछ? मई शिकायत करता हु। उसने बड़ी ही बेशर्मी से जवाब दिया की ऐसे धमकी सुन ने के हम आदि हो चुके हैं। बहुत अजीब लगा मुझे। ये किसकी जिम्मेदारी है रोकने की? रेलवे की ही है न? फिर वो रोकती क्यों नहीं है? इन हादसों को रोकने की इमानदार कोसिस होनी चाहिए वरना एक दिन ऐसा आएगा जब लोग रेल से सफ़र करने में डरने लगेंगे। ऐसी ही एक और घटना याद आती है मुझे। मई एक बार शिवगंगा एक्सप्रेस से बनारस ही जा रहा था, saare ट्रेन में बहरी वेंडोर घुसकर लोगो के नाक में दम किये हुए थे और पुलिस वाले खड़े देख रहे थे। एक महाशय का तो ४०००० रुपये का सामान गायब तक हो गया फिर भी पुलिस वालो ने ये नहीं किया की बहरी लोगो को ट्रेन से निकला जाये। जब ट्रेन में सबकुछ है फिर baahri लोग कुछ भी बेचने कैसे घुस जाते हैं। ये बहुत साड़ी समस्याएं हैं जिन्हें दूर करना है। और ये रेलवे की ही जिम्मेदारी है।

Monday, July 19, 2010

परिचय की गांठ

यूँ हीं कुछ मुस्काकर तुमने
परिचय की यह गांठ लगा दी
था पथ पर मई भुला भुला
फूल उपेक्षित कोई फुला
जाने कौन लहर थी उस दिन
तुमने अपनी याद जगा दी
कभी कभी यूँ हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूंज किसी उर में उठती है
तुमने वही हार उमगा दी
जड़ता है जीवन की पीड़ा
निस्तरंग पाशाड़ी क्रीडा
छवि के सर से दूर भगा दी
--- त्रिलोचन

Sunday, July 18, 2010

अंतर्धार्मिक शादियाँ और प्रॉब्लम

मैंने कही पढ़ा की अंतर्धार्मिक शादियों में आपको समझौता करना पड़ता है। बहुत सारी कठिनाइयां आती हैं। मै कहता हूँ की कैसी कठिनाइयाँ? क्या आम शादी में नहीं आती कठिनाइयाँ? क्या वाकई समझौता करना पड़ता है? यदि आपको लगत है तो पहले आप समझौता का मतलब समझें। यदि दो लोग अलग अलग धर्मं के हैं और उन्होंने शादी की है तो उन्हें कोई समझौता नहीं बल्कि एक दुसरे के धार्मिक भावनाओं का आदर करना पड़ता है। अब यदि आपको लगता है यही आदर समझौता है तो आप गलत हैं। ये सच है की पहले लोग सोचते हैं की हम दोनों अपने अपने धर्मं को मानते हुए एक घर में रहेंगे, पर आगे उन्हें दिक्कत होने लगती है। उनके मन में एक ऐसी बात घर कर जाती है जो प्रॉब्लम खड़ा करती है। दोनों ही एक दुसरे को अपने धर्मं की तरफ आकर्षित करने की कोसिस करते हैं। कई सारे लोग हैं जो ऐसा नहीं करते पर जो करते हैं उन्हें ही दिक्कत होती है। आप पूछते हैं की हम किस धर्मं के अनुसार अपने आचरण रखेंगे? कौन सा पर्व सेलेब्रेट करेंगे? क्या वाकई ये सवाल सही है? आप अपने घर में ईद और दीवाली साथ साथ क्यों नहीं मना सकते? सभी धर्मं सही रश्ते पर चलने की सलाह देते हैं। बस उन्हें मानिये। अगर आप दोनों साथ मनाते हैं तो ये समझौता हुआ क्या? आपको समझौते की जगह आदर की बात सोचनी चाहिए। दो लोग जब शादी करने का फैसला करते हैं धर्मं और रीति रिवाज के बंधन को छोड़कर तो वो नहीं चाहते की हमारा साथी कोई समझौता करेगा। उन्हें सिर्फ ये उम्मीद होती है की वो मेरे विश्वास की क़द्र करेगा। समझौता तो ये हुआ की किसी एक ने अपने धर्मं को छोड़कर साथी के धर्मं को अपना लिया। पर आपको तो ख़ुशी ख़ुशी दोनों ही धर्मो को मानना चाहिए। रही बात बच्चो की, की उन्हें किस धर्मं की शिक्षा देनी है? इसमें थोड़ी प्रॉब्लम हो सकती है पर इसको भी टला जा सकता है। क्या ये जरुरी है की बच्चो को किसी खास धर्मं की शिक्षा दी जाये। क्या उन्हें हम बिना किसी एक धर्मं के साथ बंधे हुए सभी धर्मो की अच्छी शिक्षाएं नहीं दे सकते? ये तभी होगा जब आपके दिल में सामने वाले के धर्मं के लिए आदर होगा और अगर आप ऐसी शादी करते हैं तो आपके दिल में ये आदर होनी चाहिए। इसलिए मै कहता हूँ समझौता नहीं आदर के बारे में सोचिये और अपने ज़िन्दगी को खुशनुमा बनाइये।

हिन्दू और सहिष्णुता.

हिन्दू और सहिष्णुता का बहुत ही गहरा सम्बन्ध है। अधिकतर हिन्दू सहिष्णु हैं और वो दुसरो के धार्मिक भावनाओ का आदर करते हैं। हमारे देश में कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग हैं जो सिर्फ हिंदुत्व को गली देने के लिए ही पैदा हुए हैं। इतनी गली देते हैं की बस पूछिये मत। फिर भी उन्हें हिन्दुओ की सहिष्णुता पर यकीन नहीं होता। उन्हें नहीं लगता की जिनके बीच में रहते हैं उन्ही को गाली देना सिर्फ हिन्दुओ के बीच में ही संभव है। वरना जाकर पूछिये उन मुस्लिम लेखको से जो की फतवों के दर से मारा मारा फिर रहे हैं। तसलीमा नसरीन ने सिर्फ बंगलादेश के हिन्दुओ की तकलीफ और उनपर हो रहे अत्याचार को दुनिया के सामने लाया था उन्हें मौत का फ़तवा मिला। पर हमारे यहाँ तो कई लोग मुस्लिमो के दुखो पर आवाज उठाते हैं, ऐसा होना भी चाहिए। हम उनके शुक्रगुजार हैं। पर उन्हें कोई मौत का फ़तवा नहीं दिया जाता है। हमारे यहाँ तो ऐसे भी लोग हैं जो आतंकवादी गतिविधियों को भी न्यायसंगत बनाने पर तुले हुए हैं। उन्हें लगता है की आतंकवाद मुस्लिमो पर हो रहे अत्याचार की प्रतिक्रिया है। फिर भी हिन्दू चुप है। इस से बड़ा उदहारण क्या है सहिष्णुता का? क्या वो कभी मुस्लिम कट्टरवाद पर बोलते हैं? जो हमारे यहाँ कम्युनिस्ट बनते हैं वो सिर्फ हिन्दुओ के मामले में। मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यको का मामला आते ही उन्हें साप सूंघ जाता है। हिन्दुओ में ही कट्टरवादियो को जवाब दिया जाता है। ऐसा नहीं होता तो हमारे देश में आज ठाकरे और तोगड़िया का शाशन होता। उन्हें ये कौन समझाए? समझा भी देते, पर समझना चाहे तब तो। उनके आँखों पर तो एक परत चढ़ी हुई है जो उतर ही नहीं सकती है। कई सरे कारण हैं। या तो वो मुस्लिम कट्टरवाद से डरते हैं या आतंकवादियों से उनकी मिलीभगत है। लोकतंत्र की बात करते हैं पर जब हमारे देश से तसलीमा नसरीन को भगाया जाता है तब इनकी आवाज नहीं निकलती। और जब हिंदुत्व को गाली देनी होती है तब इनका मुह इतना फटता है जैसे सुरसा हो। हिन्दू दंगा नहीं चाहता। हैं हमारे यहाँ कुछ असामाजिक तत्त्व जो अपने फायदे के लिए दंगे करवाते हैं, पर उन्हें जनता जवाब भी देती है। उन्हें सबक भी सिखाया जाता है। अगर हम इतने ही कट्टर होते तो हमारे राजनीती की धुरी मुस्लिमो के इर्द गिर्द नहीं घूम रही होती। हर राजनीतिक दल के अगेंदे में मुस्लिम की बात होती है पर असली बात नहीं होती है। मुझे पता है मुस्लिमो को ठगा जाता है। वो भी दंगा नहीं चाहते। वो भी शांति चाहते हैं पर उनके दिमाग में एक डर पैदा किया जाता है ताकि उनके डर का फायदा वोट के रूप में लिया जा सके। ये सारे काम कम्युनिस्ट करते हैं। ये तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग ही मुसलमानों के साथ साथ पुरे देश का विकास रोक रखे हैं। मई ये नहीं कहता की कट्टर हिन्दू सही हैं पर हमारे यहाँ न ही कोई कट्टर है न ही धर्मनिरपेक्ष। सब अपने मतलब के लिए कुछ भी बन जाते हैं। जब जैसी जरुरत होती है। जिस से उन्हें फायदा लगे। धर्मं से परेशान हिन्दू धर्मं से उतना मतलब नहीं रखता जितना एक मुस्लिम रखता है। वरना ऐसा नहीं होता की कई सालो से धर्मं के नाम पर शाशन करने वाले तालिबानियों से परेशान देश उनके गिरफ्त से छूटने के बाद भी अपना नाम " इस्लामिक रेपुब्लीक ऑफ़ अफगानिस्तान" नहीं रखता। नेपाल के नाम में हिन्दू नहीं आया है कही। जब नेपाल ने धर्मनिरपेक्ष होना स्वीकार किया तब उसने अपने नाम को भी वैसा ही रखा। दुनिया में एक भी ऐसा मुस्लिम देश नहीं है जहा लोकतंत्र मजबूत हो। जहा सबको बराबरी का अधिकार मिला हो। हमारे एम् ऍफ़ हुसैन साहब जो की तथाकथित रूप से हिन्दू कट्टरवादियो से परेशान होकर क़तर की नागरिकता ले लिए वो क्या कभी वही काम क़तर में भी कर सकते हैं जो उन्होंने भारत में किया था। नहीं, इसपर किसी की आवाज नहीं उठेगी। मुस्लिमो के दुश्मन जितने कट्टर हिन्दू हैं उतने ही ये झूठे धर्मनिरपेक्ष लोग भी। जो सच में धर्मनिरपेक्ष हैं वो ही मुस्लिमो का या किसी भी अल्पसंख्यक का भला कर रहे हैं।

Saturday, July 17, 2010

गांधीवाद और हिंदुत्व

गांधीवाद और हिंदुत्व। क्या रिश्ता है गांधीवाद और हिंदुत्व में? मेरी समझ से तो बहुत ही करीब का रिश्ता है दोनों में। एक दिन किसी से मेरी बहस हो गयी। मैंने कहा की गांधीवाद क्या है? हिंदुत्व से ही तो लिया गया है। उसने कहा ऐसा कैसे कह सकते हो। इसकी मुख्या बात तो सत्य और अहिंसा है। और ये बुद्ध और जैन धर्मं से आता है। अब मैंने जवाब दिया की पहले कौन धर्मं आया था astitva में? हिन्दू yaa बुद्ध? उसने कहा हिन्दू। और हिन्दू धर्मं का आधार क्या है? कभी आपने पढ़ा है "अहिंसा परमोधर्मः" , "परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पिड्नाम" और ऐसे ही बहुत सरे श्लोक सुनाये और पूछा की ये सरे श्लोक बुद्ध धर्मं के हैं या हिन्दू धर्मं के? ये सरे श्लोक हिन्दू धर्मं के ही हैं। " सत्यमेव जयते" ये भी हमारे मुन्दकोपनिषद से आया है। इसका मतलब ये है की बुद्ध और जैन धर्मं भी हिन्दू धर्मं के ही शिक्षाओ को बढाते हैं। महात्मा गाँधी ने क्या सिखाया? सत्य और अहिंसा। यही न। ये कहा से लिया उन्होंने? हिन्दू धर्मं से ही तो लिया। उनकी वो बात जिसमे उन्होंने कहा है की अहिंसा सिर्फ कर्म से नहीं बल्कि मन और वचन से भी होनी चाहिए। आप किसी के बारे में गलत सोच भी रहे हैं या गलत बोल रहे हैं जो की उसे कष्ट दे रहा है तो आप हिंसा कर रहे हैं। ये सरे हिंदुत्व से आये हैं। आज बहले ही हमारे देश के कुछ तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनितिक दल हिंदुत्वे शब्द का इस्तेमाल पर ही सवाल उठा रहे हैं पर ये सच है कि अगर दुनिया ने कुछ सिखा है तो हिंदुत्व से ही सिखा है। भले ही आगे चलकर उन्हें अपना बताने लगे। जैसे बहुत सारे भारतीय जड़ी बूटियों का पेटेंट विदेशी कम्पनियाँ कराने कि कोसिस कर रही हैं। "वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाने रे" महात्मा गांधी ने ये बहुत सोच समझकर कहा था। ये उनकी हिंदुत्व के प्रति आस्था ही व्यक्त करता है।

प्यार

प्यार, प्यार एक एहसास है मानसिक, भावनात्मक. इसका बॉडी से कोई रिश्ता नहीं है। सिर्फ एक ही रिश्ते में ये बॉडी से जुड़ता है। वो है pati पत्नी का रिश्ता। प्यार बहुत ही खुबसूरत होता है जो की ज़िन्दगी में रंग भर देता है। कुछ भी करने की ताकत देता है प्यार। जब कोई किसी से प्यार करता है तब वो उसके लिए आसमान से तारे भी तोड़ लाने की हिम्मत रखता है। जैसे एक माँ बाप अपने बच्चो के लिए कुछ भी करते हैं, क्योकि वो उस से प्यार करते हैं। एक सैनिक अपने देश क लिए जान दे देता है और दुश्मन की जान लेता भी है क्योकि वो अपने देश से प्यार करता है। लोग आज़ादी के लिए मर गए हमारे देश में, ब्रिटिश राज में। उन्हें ये ताकत कहा से मिलती है? प्यार से और कहा से? उन्हें अगर अपने देश से प्यार नहीं होता तो क्या वो अपने देश क लिए जान दे सकते हैं। इसलिए दुनिया की सबसे स्ट्रोंग चीज प्यार है जो स्ट्रोंग तो है ही लोगो को स्ट्रोंग बनाती भी है। प्यार में लोग कभी कमजोर नहीं होते। प्यार कभी ख़तम नहीं होता वो सिर्फ स्वरुप बदलता है” अगर आप किसी से प्यार करते हैं और उस से शादी करना चाहते हैं पर किसी कारण वश आपकी शादी उस से नहीं हो पाति है तो आपके दिल में उसके लिए प्यार ख़तम नहीं होता। प्यार तो बना रहता है। हा! वो बदल जाता है। अब पति पत्नी का प्यार नहीं रहकर किसी और रिश्ते का प्यार हो जाता है। प्यार खोजो तो हर रिश्ते में है। कोई स्पेसिफिक रिश्ता नहीं है जिसमे प्यार हो और जिसमे न हो। प्यार मतलब प्राणी मात्र से प्यार, जैसा हमारे शाश्त्रो में लिखा है। दया, करुणा, परोपकार ये सारे प्यार हैं। प्यार से चाहो तो कुछ भी मिलता है। हमारे संस्कृति में प्यार का जितना महत्व है उतना ही उसको अपने फायदा क अनुसार इस्तेमाल करने वाले लोग भी हैं। हमारी सहानुभूति भी प्यार से ही आती ही।अगर आपके सामने कोई रो रहा है और आप मुह फेरकर चल देते हैं, आपको दया नहीं आती इसका मतलब आप प्यार का मतलब नहीं जानते।
जो मानवता से प्यार नहीं कर सकता वो किसी रिश्ते से भी प्यार नहीं कर सकता। “ परोपकाराय पुण्याय पापाय पर्पिद्नाम” इस श्लोक में भी प्यार ही दीखता है। जो लोगो से प्यार करते हैं वही परोपकार कर सकते हैं और जो लोगो से नफरत करते हैं वही पाप। ऐसा नहीं हो सकता जो लोगो से प्यार करे और पाप भी। हमारी सहानुभूति किसी क दुःख को कम करती ही, दुखो पर मरहम लगाती ही तो किसी का दुःख बाधा भी सकती ही। अगर आपका कोई अपना दुखी ही और आप उस से सहानुभूति दिखा रहे हैं तो उसका दुःख कम होगा। उसे लगेगा की हा उसके दुखो को समझने वाला कोई है। पर एक लिमिट से ज्यादा सहानुभूति भी दुःख देती है। लिमिट से ज्यादा सहानुभूति दुःख को बड़ा बनाती है। उसे और दुःख होता है।

Friday, July 16, 2010

भारतीय रुपये को मिली एक नयी पहचान


बहुत दिनों से हमें भी जरुरत महसूस हो रही थी की हमारे रुपये का भी एक ख़ास चिन्ह हो जैसे डोल्लर, पौंड, येन
, स्टर्लिंग, और यूरो का है। हमारे देश का विकाश दर हमेशा उछल पर रहा है और हम किसी से पीछे क्यों रहे। हमें भी उस ग्रुप में शामिल होना चाहिए। इसीलिए हमारी सरकार ने सोचा की हम भी अपने रुपये को एक नया सिम्बोल दे। और उसने लोगो से डिजाईन मांगे। करीब ३००० डिजाईन मिले सर्कार को जिसमे से एक आई आई टी के मिस्टर डी उदय कुमार का वो डिजाईन चुना गया जो की देवनागरी और रोमन का मिश्रण था। उन्होंने इस डिजाईन को ऐसा बनाया है जैसे अपने तिरंगे को। अब हम भी एलिट ग्रुप में शामिल हो गए। इस नए सिम्बोल से क्या फायदा होगा ये तो वक्ता बतायेगा पर इतना तो है की ये सिम्बोल बाकि सरे जितने रुपये हैं, जैसे नेपाली रूपया, पाकिस्तानी रूपया, श्रीलंका रूपया उनसे अलग तो कर ही दिया। हमारे इकोनोमिस्ट बता रहे हैं की इस से हमारी इकोनोमी में भी उछाल आएगा। देखते हैं। भारत दुनिया का पाचवा देश बन गया जिसके मुद्रा की एक खास सिम्बोल है। यही हमारे लिए कम गौरव की बात नहीं है। हमारी इकोनोमी में उछाल आएगा ये बाद की बात है। इसे पूरी तरह लागु करने में ६ महीने लग जायेंगे। हमारे यहाँ न ही किसी कंप्यूटर में न ही लैपटॉप में ये सिम्बोल है तो वह लेन में थोडा टाइम तो लगेगा ही। एक बार फिर से बधाई पुरे देशवाशियो को और उन्हें जिन्होंने ये डिजाईन करने का काम किया है।

Saturday, July 3, 2010

दिल में जितनी दया है जेब में उतने पैसे तो नहीं

"दिल में जितनी दया है जेब में उतने पैसे तो नहीं" ये एक ऐसा वाकया है जो लोगो की गरीबी को दर्शाता है। ये लिखने की प्रेरणा मुझे एक ऐसी घटना से मिली जो की दिल्ली जैसे शहर के लिए आम बात है। आज तिन दिनों से डेल्ही में हमारे इलाके में पानी की किल्लत है। लोग जैसे तैसे काम चला रहे हैं। हम पानी खरीदकर पी रहे हैं और जरुरत पड़ रही है तो स्नान करने के लिए भी खरीद रहे हैं। इसी दिल्ली में कई लोग ऐसे हैं जिन्हें पीने तक के लिए पानी नहीं मिलता है नहाने के लिए तो दूर की बात है। कैसे रहते हैं वो लोग पता नहीं। दया आती है इतने गरीब लोगो पर। जी करता है उनकी मदद करू पर मेरे पास भी तो उतने पैसे नहीं हैं की मई उनकी मदद कर पाऊ। मुझे लगता है की लोगो के पास कम से कम इतने पैसे होने ही चाहिए की वो अपनी आवश्यक आवश्यकता पूरी कर ले। इसी बात पर याद आता है "दिल में जितनी दया है जेब में उतने पैसे तो नहीं हैं"।