Sunday, June 27, 2010

राज ठाकरे की दोहरी नीति

मैंने एक समाचार पढ़ा की " All eyes on Raj son's medium of study". ये कहानी है राज ठाकरे जो कि मराठी को प्रोत्शाहित करने के लिए कितने दंगे करवाए महाराष्ट्र में, जाहिर है उन्हें महाराष्ट्र और मराठी से कोई मतलब नहीं है ये सब वोट का खेल था, के बेटे के एड्मिसन की। राज ठाकरे के बेटे ने मास मीडिया कोर्स के लिए मुंबई के रुइया कॉलेज में पूछताछ की है। रुइया कॉलेज के प्रिंसिपल के अनुसार राज ठाकरे खुद अपनी पत्नी के साथ सारी जानकारी लेकर गए हैं। कौन कौन से विषय पढाये जाते हैं आदि। अब सबकी निगाह राज के बेटे के मीडियम पर है। वो कौन सा मीडियम चुनता है पढने के लिए? वो राज ठाकरे की तरह मराठी को प्राथमिकता देता है या आधुनिक युग के साथ चलते हुए अंग्रेजी मीडियम से पढता है? वैसे लगता तो नहीं है की वो मराठी मीडियम चुनेगा क्योकि आजतक की उसकी पढ़ाई अंग्रेजी मीडियम से ही हुई है। चुकी वो राज ठाकरे का बेटा है इसलिए वो तो किसी भी मीडियम से पढ़ सकता है, मराठी जरुरी तो है नहीं। मराठी तो महाराष्ट्र के छोटे लोगो के लिए जरुरी है। राज ठाकरे और बाल ठाकरे तो काफी बड़े नाम हैं। इनसे कौन पूछता है की आपका बेटा किस मीडियम से पढ़ रहा है। खुद के बेटे को तो इन्हें आधुनिक युग के साथ कदम से कदम मिला कर चलाना है पर महाराष्ट्र के लोगो को तो ये मराठी ही पढ़ाएंगे। उनसे इन्हें क्या मतलब है? उनका वोट तो मिल ही जाता है न? महाराष्ट्र के लोगो को सोचना चाहिए की क्या कर रहा है ठाकरे परिवार उनके साथ? अपने बेटो का भविष्य तो उन्हें दिख रहा है पर महाराष्ट्र की जनता के भविष्य से इन्हें कोई मतलब ही नहीं है। इस परिवार ने मराठी को प्रोत्शाहित करने के नाम पर किया ही क्या है? सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी का विरोध। किसी एक भासा के विरोध से दूसरी भाषा कैसे आगे बढ़ सकती है ये तो वही जाने। बाकि लोगो के पल्ले तो ये बात पड़ेगी नहीं। भाषा को आगे ही बढ़ाना था तो अपने बेटे को मराठी मीडियम से पढ़ाकर एक उदाहरण पेश करते। पर इस से क्या फायदा? बेटे के भविष्य का सवाल है भाई। उसके साथ कैसे खेल सकते हैं? हां, मराठियों के भविष्य के साथ तो जरुर खेल सकते हैं, वो कोई अपने थोड़े ही हैं। उनके कार्यकर्ता तो बोल रहे हैं की ये तो कोई मुद्दा ही नहीं है की हमारे नेता जी का बेटा अंग्रेजी मीडियम से पढ़े या किसी और मीडियम से। वो तो आजतक अंग्रेजी से ही पढ़ा है। उनके कार्यकर्ताओ के लिए ये मुद्दा तब बनता है जब कोई आम आदमी की बात हो। अपने बॉस से, रोजी रोटी देने वाले की बात पर कौन बोले। कार्यकर्ताओ को भी तो उनसे ही चलना है। चापलूसी तो करनी ही होगी। वो भी कोई विचारधारा की वजह से थोड़े ही उनकी पार्टी में गए हैं? वो तो जब तक ठाकरे साब खिला पिला रहे हैं तब तक बोल रहे हैं। पर ठाकरे साहब को समझ नहीं आ रहा है की उन्हें अगर थोड़ी भी महाराष्ट्र के अस्मिता का ख्याल है, या वे अपने विचारों के पक्के हैं तो अपने बेटे का एड्मिसन मराठी मीडियम में ही कराये। आजतक अंग्रेजी पढ़ा दिया कोई बात नहीं। मराठी जनता माफ़ कर देगी, पर अब नहीं। ये कैसी दोहरी नीति है की खुद का बेटा अंग्रेजी पढ़े और मराठी लोग सिर्फ मराठी पढ़े।

Wednesday, June 23, 2010

ऑनर किलिंग

कितने शर्म की बात है की जहा हमारे देश को तरक्की के पथ पर अग्रसर होना चाहिए और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए वही हम पुरानी कुरीतियों को बढ़ावा देने में लगे हैं। ऑनर किलिंग एक बदनुमा धब्बा बन गया है। हम इस ऑनर किलिंग जो की वास्तव में दिसौनर किलिंग है इतने आगे बढ़ गए कि सुप्रीम कोर्ट को खुद आगे आकर नौ राज्यों के साथ साथ केंद्र सरकार से जवाब मांगना पड़ा। ये सिर्फ हमारे गावों कि बात नहीं है ये हमारी देल्ही में भी आम बात है। किसी को भी इज्जत के नाम पर मार दो, हत्या कर दो बाद में जब पोलिस ले जाये तो इज्जत का हवाला दो। क्या दो लोग अपनी मर्जी से जिंदगी बिताने का फैसला ले लेते हैं तो इस से इज्जत चली जाती है? क्या हमारा समाज इतना गहरे तक हमारी जिंदगी में दखल देता है? क्या हमारा समाज इतना असभ्य है? क्या हम्मारी संस्कृति यही है जिसका हमलोग दुनिया कि सबसे अच्छी संस्कृति होने का दावा करते हैं? किसे चाहिए ऐसा समाज? मुझे तो बिलकुल नहीं चाहिए ऐसा समाज जो हमारी आज़ादी पर पहरे लगाये। अब कोई और ये निर्णय लेगा मेरी जिंदगी का फैसला? कैसे मै जिऊंगा? किस से शादी करूँगा? ये ज्यादातर लडकियों के साथ ही होता है। लडकियों को ही लोग कमजोर पाते हैं। उन्हें मारना भी आसन होता है। वो विरोध भी नहीं करती। वो अपने परिवार वालो से ज्यादा प्यार करती हैं इस वजह से कुछ कर नहीं पाती. जो उनसे घर वाले कहे मान लेती हैं पर आजकल उनके शिक्षा का असर है कि उन्हें भी ये लगने लगा है कि जिंदगी किस तरह से जीना चाहिए? कौन हमारे लिए अच्छा है और कौन बुरा? यही बात हमारे समाज के उन ठेकेदारों को बर्दाश्त नहीं हो रही है कि जिन लड़कियों को हमने आजतक जानवरों कि तरह अपने पैर कि जूती बनाकर रखा वही लडकियां हमें चिढ़ा रही हैं। उन्होंने थोडा पढ़ क्या लिया उन्हें लगता है कि वो आजाद हो गयी। पर हम ऐसा होने नहीं देंगे। महिलाये आजतक गुलाम थी अब भी रहेंगी। चाहे हम कितने भी तरक्की कर ले। जिसे शाशन करने कि आदत लग जाती है उनके दिमाग से सत्ता का भूत उतरता नहीं है। वही बात आज हमारे समाज के ठेकेदारों के साथ है, उन्हें लगता है अब भी समय है इन्हें दबा दो वरना बात बहुत आगे निकल जाएगी और इनपर से हमारा शाशन ही ख़तम हो जायेगा। ये हवाला देते हैं परम्पराओ का, संस्कृति का, इज्जत का। कौन सी संस्कृति कि बात करते हैं? किस परंपरा कि बात करते हैं ये? क्या जानते हैं ये अपनी संस्कृति के बारे में? क्या इन्हें पता नहीं है कि हमारी संस्कृति ने अहिंसा को महत्व दिया है? रही बात परंपरा कि तो " परंपरा इन्सान के लिए बनते हैं, इन्सान परंपरा के लिए नहीं" जब भी इन्सान को जरुरत हो परम्पराए बदली हैं। ये अलग बात है कि बड़े लोगो ने ही परम्पराए बदली है हमेशा। और बड़े लोग अपनी मर्जी से शादी भी कर लेते हैं तो इनकी आवाज नहीं उठेगी, ये मेरा दावा है।
ये ना ही गोत्र कि बात है, ना ही परंपरा कि, न ही संस्कृति कि, ये बात है तो सिर्फ और सिर्फ औरतो पर शाशन करने कि प्रवृत्ति कि। इनसे ये बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है कि जिन औरतो को हमने पैरो कि जूती बना कर रखा उन्हें आज ये अधिकार मिल गया कि वो अपने जिंदगी के फैसले खुद ले ले? ऐसा हम नहीं होने देंगे। जिस हरियाणा में ये किलिंग सबसे ज्यादा होती है उसी हरियाणा में एक ips ऑफिसर ने एक उभरते टेनिस खिलाडी को आत्माहत्या करने पर मजबूर किया और उसका यौन शोषण किया. इस से हमारे हरियाणा कि इज्जत बढ़ी थी क्या? इसके खिलाफ तो किसी पंचायत ने आवाज नहीं उठाया, जबकि ये सबसे संगीन मामला था जिस से किसी कि इज्जत जाती है। पर ये तो एक ताकतवर ips ऑफिसर से जुड़ा मामला था न? इसके खिलाफ कोई क्यों आवाज उठाये? आवाज तो उनके खिलाफ उठेगी जो कमजोर हैं चाहे वो कुछ गलत किये हो या नहीं। इनकी आवाज समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ उठनी चाहिए जैसे दहेज़, भ्रूण हत्या, महिलाओ से छेड़छाड़, आदि, पर इन सब मामलो में तो ये खुद फसे हुए हैं, इनके खिलाफ आवाज क्यों उठाएंगे?
सरकार को इन पंचायतो के खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाना चाहिए वरना एक दिन ये देश के लिए नाशुर बन जायेंगे। इन्हें रोकने बेहद जरुरी है क्योकि सिर्फ आर्थिक तरक्की ही सबकुछ नहीं है हमें सामाजिक रूप से भी विकसित होना चाहिए। इनकी मनमानी नहीं रोकी गयी तो एक दिन ये सरकार तक को चुनौती देंगे और सरकार कि मज़बूरी हो जाएगी इनकी हर नाजायज मांगो को मानना। इस से पहले कि ये बहुत आगे निकल जाये इन्हें रोकना चाहिए। खासकर ऐसे लोगो को तो शख्त सजा देनी चाहिए जो इसे बढ़ावा देते हैं और जिन्हें कोई अफ़सोस नहीं होता ये करने के बाद भी।

Sunday, June 20, 2010

वन्दे मातरम


वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यशामलां मातरम् ।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीं
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं
सुखदां वरदां मातरम् ।। १ ।। वन्दे मातरम् ।
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले ।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं
रिपुदलवारिणीं मातरम् ।। २ ।। वन्दे मातरम् ।
तुमि विद्या, तुमि धर्म
तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वं हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमारई प्रतिमा गडि
मन्दिरे-मन्दिरे मातरम् ।। ३ ।। वन्दे मातरम् ।
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलां
सुजलां सुफलां मातरम् ।। ४ ।। वन्दे मातरम् ।
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
धरणीं भरणीं मातरम् ।। ५ ।। वन्दे मातरम् ।।

Saturday, June 19, 2010

I Love You Papa


अभी हम फादर्स डे मानाने पर पूरा जोर दे रहे हैं। ये दिन लोग अपने पिता के महत्व को समझाने और प्यार देने के लिए करते हैं। ये दिन पूरी तरह से पिता के लिए समर्पित होता है। ये सच है की पिता के दिए गए कर्जो को हम इस एक दिन को सेलेब्रेट कर लेने से नहीं चुकता कर देंगे पर इस से कम से कम हर पिता के चेहरे पर थोड़ी ख़ुशी तो दे ही सकते हैं। कम से कम इस दिन तो हम अपने पिता को जाता ही सकते हैं की " मेरे प्यारे पापा, हम आपसे बहुत प्यार करते हैं और संकल्प लेते हैं कि हमेशा करते रहेंगे"। उनके द्वारा किये गए हमारी परवरिश के लिए हम आभार तो जता ही सकते हैं। पिता एक ऐसा शब्द है जिसे सुनकर सभी भावुक हो जाते हैं, सभी अपने पिता से प्यार करते हैं पर आज के इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में लोगो के पास समय नहीं रहता अपने पिता के लिए। यही दिन उन्हें संकल्प लेना चाहिए " चाहे कितने भी व्यस्त हम क्यों न रहे, अपने प्यारे पापा के लिए समय निकल ही लेंगे" आपके पिता को आपसे कुछ और नहीं चाहिए, चाहिए तो सिर्फ थोडा सा प्यार और समय जो आप उनके साथ बिताये। आपके माँ बाप कितने भी व्यस्त रहे आपको खुद से ज्यादा अच्छी तरह से पला, आपको किसी चीज कि कमी नहीं होने दी, खुद पेट कट कर रह लिए पर आपके लिए सब कुछ ला कर रख दिया। क्या आज के दिन सिर्फ कोई गिफ्ट देकर और " आई लव यु पापा" बोलकर आप अपने कर्तव्यों कि इतिश्री कर लेंगे? आज के दिन हमें संकल्प लेना चाहिए कि जिस तरह हमारे पापा ने हमारी परवरिश कि है उसी तरह आप भी उनका ख्याल रखेंगे. पिता का महत्व ज़िन्दगी में कभी कम नहीं होता। चाहे हम कितने भी बड़े हो जाये, कितने भी समझदार हो जाये पर अपने पापा से ज्यादा समझदार नहीं हो सकते।
हमारे देश में कुछ लोग फादर्स डे, मदर्स डे, मानाने का विरोध करते हैं कि हमारी संस्कृति में तो रोज पिता के सम्मान के लिए होता है तो एक विशेष दिन क्यों? पर उन्हें सोचना चाहिए कि हर संस्कृति में पिता को सम्मान देने कि बात है। पर ये विशेष दिन होता है अपना प्यार जताने के लिए और संकल्प लेने के लिए कि हम अपने पापा का पूरी ज़िन्दगी अच्छी तरह से ख़याल रखेंगे और इन्हें कोई भी तकलीफ नहीं होने देंगे। ये दिन एक सिम्बल है। जिस तरह से हमारे दसहरा और दिवाली सिम्बल हैं बुराई पर अच्छाई कि विजय का, अँधेरे पर प्रकाश के विजय का।
"आई लव यु पापा" आज के दिन हम संकल्प लेते हैं कि आप ही हमारे भगवान् हैं, और हम आपका हमेशा ख्याल रखेंगे ताकि आप खुश रहे। हम कितना भी आपके लिए कर दे, वो आपके द्वारा दिए गए प्यार के बराबर नहीं होगा। मात्रि ऋण और पित्री ऋण से कभी कोई मुक्त नहीं होता क्योकि उतना कोई कर ही नहीं पाता जितना माँ बाप ने बच्चो के लिए कर दिया हो।

नितीश कुमार का अहंकार


बिहार बाढ़ की विभीषिका से जूझ रहा था। लोग मर रहे थे, बेघर हो रहे थे, करोडो की संपत्ति नष्ट हो रही थी। ऐसे में गुजरात सरकार ने थोड़ी मदद की। बुरे समय में गुजरात सरकार काम आई। उसने हमें मदद दी और उसे नितीश कुमार ने नरेन्द्र मोदी से व्यक्तिगत दुश्मनी की वजह से वो मदद राशि लौटा दी। अब जब चुनाव सर पर हैं तब उन्हें याद आया की ये मदद राशि मुस्लिमो में गलत सन्देश ले जायेगा। मुस्लिमो को अच्छा नहीं लगेगा की हमारी सरकार ने मोदी से मदद ली है। क्या बाढ़ से मरने वालो में कोई मुस्लिम नहीं था? मरते इन्सान को ये नहीं पता होता है की मदद राशि कहा से आई है, उसे सिर्फ ये पता होता है की हमें मदद मिल रही है। और ये मदद मोदी ने नहीं बल्कि गुरत सरकार ने बिहार के बाढ़ पीडितो के लिए दिया था. ये सिर्फ और सिर्फ नितीश का अहंकार है जिसकी वजह से उन्होंने पैसे लौटा दिए। पर सोचा नहीं की इसका असर क्या होगा? ये कदम गुजरातियों और बिहारियों में वैमनस्य भी फैला सकता है। गुजरातियों को अपमानित कर सकता है की जिसकी मदद करो वो हमारी मदद की क़द्र नहीं करता है। आगे हमें मदद मिलने में परेशानी होगी।
आज नितीश को अहंकार ने घेर लिया है। उन्हें लगता है की वो भाजपा के बिना भी सत्ता में आ सकते हैं। उन्हें लगता है कि बिहार कि जनता ने उन्हें अपना नेता मन लिया है पर उन्हें पता होना चाहिए कि ये उनकी गलत फहमी है। उन्हें मुख्यमंत्री बनाना मज़बूरी थी, राजद के कुसासन से लोग उब चुके थे इस वजह से उन्हें मौका मिला। और अगर यही हरकत नितीश कि जारी रही तो जनता कोई और विकल्प खोज लेगी। जनता को किसी से कोई मतलब नहीं है। जनता को रोटी कपडा और मकान आदि बेसिक चीजे चाहिए। और विकास चाहिए। उन्हें ये नहीं पता है कि मोदी को गुजरात कि जनता ने अपना नेता माना है। उन्हें किसी मज़बूरी कि वजह से मुख्यमंत्री कि गद्दी नहीं मिली है। उन्हें जनता का प्यार मिला है।
नितीश कुमार को ये सोचना चाहिए था कि ये मदद मोदी ने नहीं गुजरात सरकार ने दी है। मोदी ने अपने घर से नितीश के जेब में तो कुछ डाला नहीं था। फिर ये पैसा नितीश मोदी को कैसे लौटा सकते हैं? ये पैसा बिहार ने गुजरात को लौटाया है क्या? नितीश ने बिहारियों कि इच्छा के खिलाफ गुजरात को उसकी मदद लौटा दी। हर साल बिहार में बाढ़ से हजारो लोग मरते हैं, कई लोग बेघर होते हैं, लाखो कि संपत्ति नष्ट होती है, इसके लिए नितीश कुमार ने तो कुछ किया नहीं उलटे एक भाई के द्वारा दी गयी मदद राशि लौटा दी। वह रे हमारे नितीश जी। हर साल एक ही आपदा कैसे आ सकती है? जब हमें पता है कि हर साल बाद आता है तो हम उसे रोक नहीं सकते?
सो नितीश कुमार जी आपसे हमारी गुजारिश है कि ये अपने अहंकार को थोडा अन्दर रखकर बिहार कि भलाई के लिए कुछ काम करे।

मेरे डैडी एन लैंडर्स द्वारा ( फादर्स डे के उपलक्ष्य में )


मेरे डैडी
जब मेरी उम्र थी
4 साल ---- मेरे डैडी कुछ भी कर सकते हैं।
5 साल --- मेरे डैडी बहुत कुछ कर सकते हैं।
6 साल --- मेरे डैडी तुम्हारे डैडी से ज्यादा स्मार्ट हैं।
8 साल --- मेरे डैडी हर चीज नहीं जानते।
10 साल -- पुराने जमाने में जब डैडी बड़े हो रहे थे तब परिस्थितियाँ निश्चित रूप से अलग रही होंगी।
12 साल--- जाहिर है डैडी इस बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। वे इतने बड़े हो चुके हैं की उन्हें अपने बचपन ही याद नहीं है।
14 साल --- मेरे डैडी की तरफ ध्यान मत दो। वो पुराने खयालो के हैं।
21 साल --- हे भगवान, वे तो बहुत ही दकियानूसी हैं।
25 साल --- डैडी इसके बारे में थोडा बहुत जानते हैं, लेकिन ऐसा इसलिए की वे बड़े हैं।
30 साल--- शायद हमें डैडी से उनके विचार पूछ लेने चाहिए। आखिर उनके पास बहुत अनुभव है।
35 साल --- मै अपने डैडी से पूछे बिना कुछ भी नहीं करूँगा।
40 साल --- क्या पता डैडी इसे कैसे सुलझाते? वे इतने समझदार और अनुभवी थे।
50 साल --- काश! डैडी इस वक्ता यहाँ होते, और मै उनसे इस बारे में सलाह ले सकता। अफ़सोस मै यह नहीं समझ पाया की वे कितने स्मार्ट थे?
----एन लैंडर्स

Thursday, June 17, 2010

वन्दे मातरम




संघ प्रार्थना गीत (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ )


नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम् ।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते ।।१।।
प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयं
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये ।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत् ।।२।।
समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम् ।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम् ।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम् ।।३।।
।। भारत माता की जय ।।
।। भारत माता की जय ।।

Wednesday, June 16, 2010

महात्मा गाँधी आलोचनाओ से परे


महात्मा गांधी। ये नाम। आप ये नाम सुनकर श्रद्धा से सर झुका लेते हैं। जो नाम देशभक्ति का उदहारण बनता है। आप ये सोचने लगते हैं की ये संत नहीं होता तो हमारा देश आज़ाद नहीं हुआ होता। आज ये ज़िंदा होता तो हमारे देश की हालत पर रो रहा होता। इतनी श्रद्धा जिसके लिए दिल में है उसी को हमारे देशवासियों ने राष्ट्रपिता का दर्जा दिया है। उसपर भी आज ऊँगली उठाने वाले लोग हैं हमारे बीच। मैंने कही पढ़ा एक सवाल पूछा गया था " क्या महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता का दजा मिलना चाहिए?" पहले तो ये सवाल इतना बेतुका और बेहूदा लगा की इसकी उपेक्षा कर दी जाये पर इसका जवाब देना सही समझा मैंने। किस तरह के लोगो के दिमाग में ऐसे सवाल आते हैं? जिस इन्सान ने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, अपने जान की परवाह नहीं की, उस इन्सान पर ऊँगली उठा रहे है हम। ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है। हम ही इतने बुद्धिमान हैं की ये सब कर सके। क्या होगा हमारे देश का जिसमे हम उस संत पर कीचड़ उछल रहे हैं जो की हमारे देश में रामराज्य लाना चाहता था। आज की स्थिति देखकर वो खुद ही मर जाता। मुझे आजतक बापू की तरह का संत नहीं मिला। आपको वो गाना याद होगा "साबरमती के संत तुने कर दिया कमाल"। वास्तव में बापू ने कमल कर दिया। जहा आजकल लोग अपना घर भरने के चक्कर में रहते हैं, अपने बच्चो के लिए विरासत बनाते हैं उनसे अलग थे हमारे बापू। उन्होंने अपने परिवार के लिए कुछ अलग नहीं किया क्योकि पूरा देश ही उनका परिवार था। पर कुछ लोग जो उनपर ऊँगली उठाते हैं उन्हें समझ में आये तब तो। क्यों नहीं लोग एक संत पर कीचड़ उछलने की जगह कुछ समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ लिखते? आज क्या क्या हो रहा है हमारे देश में? इज्जत के नाम पर लोगो की हत्याए हो रही है, दहेज़ के लिए हत्याए हो रही है, जात, धर्मं के नाम पर झगडे हो रहे हैं। इस विषय में तो कुछ लिख नहीं रहे हैं लोग। संत पर ऊँगली उठाना आसान है क्योकि संत तो माफ़ कर देते हैं न? कल ही दिल्ली में दो हत्याए हुई इज्जत के नाम पर, लोग तमाशबीन की तरह देखते रहे पर किसी ने पुलिस को कॉल नहीं की। पर उन्हें अगर बोल दो किसी संत पर कीचड़ उछालना है तो काफी आगे रहते हैं। ये सवाल कितना बेहूदा है? राष्ट्रपिता का पद कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का पद नहीं है जिसपर सवाल उठते हैं। ये एक ऐसा पद है जो जनता ने प्यार से दिया है। जिसे कोई छिन नहीं सकता। महात्मा गांधी चाहते तो कोई प्रतिष्ठित पद ले सकते थे आज़ादी के बाद पर नहीं। उनका काम था देश को आज़ाद करना सो उन्होंने कराया और उनका काम ख़तम हो गया। उन्हें कोई लालच नहीं थी। शरम आनी चाहिए हम भारतीयों को जो इस तरह की बात कर रहे हैं। कुछ लोगो की वजह से ऐसा हो रहा है। महात्मा गाँधी किसी के इज्जत के मोहताज नहीं हैं। नोबेल कमिटी ने भी अफ़सोस किया है की उन्होंने शांति का नोबेल पुरस्कार नहीं दिया। आज पूरी दुनिया जिस गाँधी को पुजती है उसी पर हमारे कुछ देशवाशी भाई ऊँगली उठा रहे हैं। आज जो राजनेता हैं उन्हें महिमामंडित किया जाता है पर संत लोगो पर ऊँगली उठाई जाती है। आदत सुधारिए भाई। शरम करिए जरा।

people's iresponsibility in recent case of honoue killing

what has happened to our society? how many lives we will give in the name of honor? people are making fun of our constitution by killing youths in the name of honor. How can we tolerate these things in society which we claim best culture in the world? People who do not involve and spectator even don't bother to call the police. Recently in Delhi own family killed youths in the name of honor. girl and boy from Gokulpuri loved each other but family members were opposing. they didn't tolerate their meeting and killed both. they were torturing and neighbors were just spectator. they didn't even bother to call police. they would have save two lives if they call the police but they were only spectator. no one try to be here responsible citizen. They think don't interfere in any matter until and unless it is related with us. even it cost one's life. how can we claim our culture as best culture in world I don't understand. We should not claim ourselves best but try to be best. we are not caring about law and order, we are making fun of law. even family members don't regret they have done anything wrong. uncle of girl is saying he would punish her again if get a chance. What happened to kindness which is best part of our culture? I always oppose "Death penalty" these cases prove me wrong and I start thinking, there should be death penalty for cruel person like them. I want people to even call the police when they see crimes like these.

Tuesday, June 15, 2010

Jeena Isi Kaa Naam Hai: साहस (स्वामी विवेकानंद द्वारा )

Jeena Isi Kaa Naam Hai: साहस (स्वामी विवेकानंद द्वारा )

साहस (स्वामी विवेकानंद द्वारा )


भय से ही दुःख आते हैं। भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयों का जन्म होता है। भय एक तरह से गुलामी है। गुलाम आज़ाद होने के लिए तड़पता है , वैसे ही भयग्रस्त व्याक्ति भी मन ही मन तड़पता है। कुछ लोग अकेले में बहादुर होते हैं या बहादुरी की बाते करते हैं , लेकिन जब मुखर होने का समय आता है , तब चुप्पी साध जाते हैं, इधर उधर देखने लगते हैं। इस समय उनके मन में तरह तरह के प्रश्न उठ रहे होते हैं, शंकाओं से बोझिल प्रश्न। अप्रत्याशित डर से वो मौन जरुर हो जाते हैं किन्तु उनकी आत्मा उन्हें धिक्कारती है। इस धिक्कार की प्रतिक्रिया में वे अकेले में कुछ करने लगते हैं, क्रोधित हो उठते हैं, गाली गौज बकने लगते हैं। अव्यक्त मन की यही परिणति होती है। नकारात्मक चिंतन गुण नहीं अवगुण है। सच को सच कहने का साहस मनुष्य की पहचान होनी चाहिए। यही गुण उसे श्रेष्ठ बनाता है। इस गुण के अभाव में मनुष्य भीरु बन जाता है। भीतर से कमजोर व्यक्ति कभी साहसी नहीं होता।

Monday, June 14, 2010

Reading Novel vs Watching Movies


Reading books or Novels and watching Movies are both the source of entertainment and can spread knowledge. But do you know which is the best source of entertainment and knowledge? some person says Movies are better and some says Novels are better. But I think reading novels are more entertaining than watching a movie. novel can be more knowledgeable than watching movie. A film director reads a novel and study it deeply and make a film on that. But he make some changes in his film according to market taste. It deviates it from originality of novels. do you think there is difference between reading a original novel is more entertaining than watching movie which has killed the soul of novel? Yes there is difference. when we heard about a movie which is inspired by particular novel, we expect from that they will show us original form of book but what we see irritate us. If we read novel we can learn many things for example, we can be master in particular language, and we gain some imagination power to write something but while watching movie our emphasis is on entertainment only. But novels also entertain us. if we choose right kind of novel which suits our interest we must enjoy reading and give some knowledge but watching movie can entertain us but don't provide us any knowledge. Movie can spread more easily but who reads novels and try to read it will be beneficial,for them. Movie has contributed much in development of society but Movie comes after Novels. Movies can not be prepare without Novels.
All the best for reading Novels and keep reading

Sunday, June 13, 2010

कार ही क्यों जरुरी, किताब क्यों नहीं?

उपभोग की वस्तुओ में कार को ही क्यों जरुरी समझा जाये? किताब को क्यों नहीं? आज की दुनिया में किताब पढने वालो की संख्या घटती जा रही है। आखिर लोगो को पढने के सुख से या संस्कृति या मनोरंजन के क्षेत्रो से प्राप्त होने वाले संतोष से क्यों वंचित किया जाना चाहिए? क्या मनुष्य के लिए भौतिक सम्पदा ही जरुरी है, आत्मिक समृद्धि नहीं?
तर्क दिया जाता है की आज के मनुष्य के पास आत्मिक समृद्धि के लिए समय कहाँ? लेकिन मई कहता हूँ स्त्री पुरुषो के लिए आठ घंटे ही काम करना क्यों जरुरी है? अगर हमारे पास तकनीक है जो हमारी उत्पादकता बढ़ा सकती है तो लोग आठ की बजे चार घंटे ही काम क्यों न करे? इस तरह बेरोजगारी भी दूर होगी और लोगो के पास फुर्सत भी ज्यादा होगा। जब मनुष्य ने अपनी बुद्धि से मानवता की खुशहाली के लिए नई तकनीक और तरीके विकसित कर लिए हैं तो लोग दिन रात पैसा कमाने के ही फेर में क्यों पड़े रहे? भूखे बीमार बेरोजगार क्यों रहे? ज्ञान विज्ञान संस्कृति और दूसरी मानवीय चीजो से वंचित क्यों रहे? वे कुछ विशेषाधिकार प्राप्त और शक्तिशाली अभिजनो के व्यावसायिक लाभ या मुनाफे के लिए उन पागल बना देने वाले आर्थिक नियमो के अनुसार क्यों जिए जो कभी शाश्वत या अपरिवर्तनीय नहीं थे, जो बदलते रहे हैं, और जिनका बदलना निश्चित है।
फिदेल कास्त्रो

Thursday, June 10, 2010

Poverty


One day I was at a Railway Station and eating something. Suddenly I felt some gathering around me. There are some poor, mal nutrient children who were beggibg me what I was eating. First I scold them but they didn’t left me. They kept begging because they were in need. They were hungry, in hunger nobody care about self respect and they were grown up in condition where self respect doesn’t mean anything. They were helpless. I felt some kindness and give my food to a child whom I guessed most hungry among them. I tried to give him and he snatched me. What I saw then I can’t forget in my whole life. He shows as much happiness of getting food as I never had. He seems like he has got some kind of “Khazana”. Like this food was everything for him. He jumped with joy. And most surprising thing I saw was that he didn’t eat this food, he offered a girl, perhaps she was his sister. A child who is dying to eat something, dying from starvation, gets food and offer it to someone else. It was very surprising for us, for the person who never experienced such kind of poverty. He offered his food, how ever she was his sister but still he did some kind of kindness and shows some values which only can be find in few person.
Then I thought is there any use of our development untill and unless we remove poverty. We are removibg poverty in paper but in reality many people are there who has not a penny of money to fulfill their basic needs. We want to eradicate begging but how? Only on paper? We should think. How can we make our country a developed country where each and every people should have as much money by which he can fullfil his basic needs.

Wednesday, June 9, 2010

Smoking in India

Smoking is widely spread evil in India. 60% population in India smoke or chew tobacco. Mainly men are involved in Smoking kills 900,000 people every year in India. Revenue of tobacco companies goes higher and higher.
Smoking may soon account for 20 percent of all male deaths and 5 percent of all female deaths among Indians between the ages of 30 and 69.
About 61 percent of men who smoke can expect to die between the ages of 30 and 69, compared with only 41 percent of non-smoking men who are similar in other ways.
About 62 percent of women who smoke can expect to die between the ages of 30 and 69, compared to only 38 percent of non-smoking women.
On average, men who smoke bidi—the popular hand-rolled cigarettes that contain about one-quarter as much tobacco as a full-sized cigarette—shorten their lives by about six years. Men who smoke full-sized cigarettes lose about 10 years of life.
Bidi-smoking women shorten their lives by about eight years on average. Smoking 1-7 bidis a day, for example, raised mortality risks by 25 percent while smoking an equal number of cigarettes daily doubled the risk of death to 50 percent.
Tobacco companies are targeting women
Now tobacco market has been saturated in men community and there is very big opportunity in women community for companies. Women are far from this evil. Now tobacco companies are targeting women. Women are their target market. However India is no 3rd in world regarding woman smoker. USA is first with 2.3 crore women smoker and China is second with 1.3 crore women smoker. But as far as percentage we are in safe position. There are below 20% women smoker here. This is the main thing which tobacco companies hit Indian women. Indian women are their target market because there is more opportunity for them. Indian government has banned smoking in public place. But can we implement it practically? Is our system able to practice it? Not yet. But we have to be strict on our rules and regulations otherwise whole population will involve in a deadly evil “Smoking” and it will be most dangerous stage.
We have to be careful

भोपाल गैस कांड , कब तक सोते रहेंगे हम?

हमारी सरकार की नजरो में अपने नागरिको के जान की कीमत है या नहीं? इतने बड़े भोपाल गैस कांड में पहले तो न्याय मिलने में लोगो को २५ साल लगते हैं उस पर भी न्याय ऐसा मिलता है जिस पर आप हस भी नहीं सकते, सिर्फ गुस्सा कर सकते हैं या रो सकते हैं। १५००० लोगो के जान की कीमत क्या लगी? २ साल की सजा और थोडा सा जुरमाना? आज तक अदालत ने वारेन एंडरसन को भगोड़ा घोषित किया है पर हम अमेरिका पर इतना दबाव नहीं दाल सके की वो उसे प्रत्यर्पित करे। क्या एक भारतीय भी अगर अमेरिका में ऐसा करके भाग आता तो हम नहीं प्रत्यर्पित करते? क्या हमारी सरकार को अमेरिका चलाती है? किसी ने फैसले का समर्थन नहीं किया, कैसे करे? कोई अँधा ही इस फैसले को सही कह सकता है। कहा जाता है " देर से मिला न्याय न्याय नहीं होता " पर ये न्याय तो देर भी मिला और वास्तव में न्याय नहीं है। आखिर न्याय मिलने में इतनी देर क्यों लगती है हमारे यहाँ? क्यों नहीं हम अदालतों की संख्या बढाकर जल्दी न्याय दिला सकते हैं? हमारे यहाँ न्याय को जानबूझकर देर किया जाता है ताकि उसके सबूतों और गवाहों से छेड़छाड़ किया जा सके। जिनके खिलाफ्फ़ मामला है वो अगर बड़े लोग हैं तो वो जानबूझकर मामले को खिचवाते हैं ताकि आराम से वो जेल के बाहर रहे और मामले को दबाने की कोसिस करे। क्यों उपहार सिनेमा में आग लगती है तो हंगामा मचता है और मुवावजा भी ज्यादा लिया जाता है पर एक अमेरिकी कंपनी यही करती है उसे बचने की कोसिस की जाती है? इसमें न तो सरकार की गलती है न ही किसी और की। इसमें सिर्फ और सिर्फ गलती है तो पब्लिक की। अमेरिका में सरकार के लिए जनता के जान की कीमत क्यों है? कभी आपने सोचा है? वह के नेता भी हमारे नेताओ की तरह ही भ्रष्ट हैं पर वो जनता से डरते हैं। वो जनता पढ़ी लिखी है और गलत कम का गलत नतीजा भी देती है सरकार को। हमारी तरह जात पात क झगड़ो में नहीं पड़ी है। अमेरिकी जनता को कोई नेता आपस में नहीं लड़ा सकता पर हमें तो जो चाहे जब चाहे आपस में लड़ा देगा। जरुरत है हमें सुधरने की। जानते हैं ये इतनी जल्दी संभव नहीं है पर आशावादी बनो , ये हो सकता है जब हम रोयेंगे तो हमारी सरकार रोएगी। हम हसेंगे तो हमारी सरकार हसेगी.

सम्मान

आप किसी को कुछ दे सकते हैं तो सम्मान दीजिये. सम्मान की जरुरत सबको होती है. सम्मान सबको अच्छा लगता है चाहे वो गरीब हो आमिर हो, छोटा हो, बड़ा हो या बराबर वाला. सम्मान दिल से होनी चाहिए सिर्फ बातो से नहीं. आप किसी को बातो में पूरा सम्मान दे रहे हैं, सर बोल रहे हैं, जी बोल रहे हैं पर दिल में उसी क लिए गलत भावना है तो उस सम्मान का कोई मतलब नहीं है. ऐसा नहीं है की उसे पता नहीं चलेगा, वो बेवकुफ नहीं है वो सब समझ जायेगा. महात्मा गाँधी, हमारे फाठेर ऑफ़ नातिओं ने अहिंसा को परिभासित करते हुए कहा था की “अहिंसा मनसा कर्मना वाचा होनी चाहिए” मतलब अहिंसा सिर्फ कर्म से नहीं मन से और वचन से भी होनी चाहिए. उन्होंने कहा की किसी क लिए गलत विचार मत रखो, कोइसी को अपनी बातो से हर्ट मत करो, और न ही अपने कर्मो से. यदि आप ऐसा कर पते हैं तभी आप सच्चे गांधीवादी या अहिंसक कहे जायेंगे aanyathaa आप सच्चे अहिंसक नहीं हैं.आज गरीब इन्सान पूरी मेहनत से बेसिक नीड्स तो पूरा कर लेता है, उसे “रोटी कपडा और माकन”मिल जाता है पर बहुत मेहनत करने क बाद भी सम्मान नहीं पता. सभी उसे कम क बदले पैसे दे देते हैं पर इस भाव से की वो उस पर एहसान कर रहे हैं. वो ये नहीं समझते की ये उसका हक़ है. उसे सबसे अधिक सम्मान की जरुरत है. मैंने कल एक मूवी देखा राजनीती. उसमे दलित सूरज क पास इतने पैसे हैं की कम चला ले पर सम्मान नहीं है. कोई उसे बड़ा नहीं मानता. उस से ढंग से लोग बात भी नहीं करते बड़े लोग. उसके लिए भगवान् बनकर उभरता है वीरेंदर प्रताप(मनोज वाजपेयी). वो उसे सम्मान देता है. भले ही अपने स्वार्थ की वजह से देता है पर उसे रेसपेक्ट मिलती है. और दलित युवक भी उसके लिए जन दे देता है.गरीब इन्सान कभी बेईमान नहीं होता नियत से. भले ही मज़बूरी में वो कुछ पैसो की हेराफेरी कर ले पर दिल से कभी वो नहीं चाहता की वो बेईमानी करे. हम शौपिंग माल्स में जाते हैं, हजारो उड़ा देते हैं पर जब रिक्शा बैठते हैं उसे १० की जगह १५ नहीं देते हैं. हंगामा खड़ा करते हैं. पोलिसे को बुलाते हैं उसे जेल भिजवाते हैं. गरीब कभी किसी से ज्यादा पैसा लेता भी है तो वो उसके जेब में कम और अमीरों क जेब में ज्यादा जाता है. एक गरीब को आप सम्मान दो वो आपको सबकुछ दे देगा. क्युकी सम्मान ही एक ऐसी चीज है जो उसे मिलती नहीं है और वो चाहता है. धन उसे जितना मिलता है उसमे खुश रहता है पर सम्मान की भूख उसे होती है. इस लिए आप लोग गरीबो कुछ और दे या न दे पर सम्मान जरुर दे. पैसे तो सब नहीं दे सकते इस महंगाई में पर सम्मान तो कभी महंगा नहीं होता, वो तो आप दे सकते हैं।

Monday, June 7, 2010

justice delayed, and denied in bhopal gas leak case


25 yrs ago a company named "Union Carbide" was responsible for leakage of gas which caused to death of 15000 people and affected indirectly above 5 lacs people. chief of this company got arrested and got bail. he escaped and declare fugitive by Indian court. USA government refused to expatriate him. today our court pronounce justice. seven held guilty and get 2 yrs imprisonment and some fines. person who are responsible for killing 15000 people gets this punishment. it is useless. they get bail soon too. it's well said "justice delayed is justice denied". here there are both justice delayed and denied both. they have been charged under
1. section 304A IPC (causing death by negligence) 2 yrs jail and rs 1lac fine
2. section 336 (endangering life) 3 months jail and rs 250 fine
3. section 337 (causing hurt) 6 months jail and rs 500 fine
4. section 338(grievous hurt) 2 yrs jail and rs 1000 fine
do you think this is enough for those who killed 15000 people. no not at all. this is mockery of justice. we couldn't provide justice to families of person who are victims of gas leak case.

Friday, June 4, 2010

Somebody's Mother

The woman was old and ragged and gray
And bent with the chill of the winter’s day.
The street was wet with the recent snow
And the woman’s feet were aged and slow.
She stood at the crossing and waited long.
Alone, uncared for, amid the throng
Of human beings passed her by
Nor heeded the glance of her anxious eye
Down the street with laughter and shout
Glad in the freedom of ‘school let out’
Come the boys like a flock of sheep
Hailing the snow piled white and deep
Past the woman so old and gray
Hastened the children on their way
Nor offered a helping hand to her
So meek, so tired afraid to stir
Lest the carriage wheels or horses feet
Should crowd her down in the slippery street
At last come one of the merry troop
The gayest laddie of all the group
He paused beside her and whispered her low
“ I”ll help you cross, if you wish to go”
Her aged hand on his strong young arm
She placed and so, without hurt or harm
He guided the trembling feet along
Proud that his own were firm and strong
Then back again to his friends he went
His young heart happy and well content
‘ She’s somebody’s mother, boys, you know?
For all she’s aged and poor and slow
And I hope some fellow will lend a hand
To help my mother, you understand?
‘ If ever she’s poor and old and gray’
When her own dear boy is far away
And ‘ somebody’s mother’ bowed low her head
In her home that night and the prayer she said
Was ‘ God be kind to the noble boy’
Who is sombody’s son and pride and joy
—-MARY DOW BRINE

Is kiss symbol of sex or love?

Differet person, different opinion. Some body says “kiss is a symbol of love”, somebody says “kiss is a symbol of sex”. I agree kiss enhance the enjoyment of sex but can we say it is the symbol of sex? We can kiss someone with affection. We can kiss someone to express our love, our affection to him/her. Actually kiss can be symbol of any of two, “love” or “sex”. It totally depends upon person who is kissing and to whom he is kissing. If a mother kiss a child, or father kiss his son or daughter, then how can we say that there is sex. We can’t say that. Not at all. There is only “love”. When a boyfriend kiss his girlfriend or girlfriend kiss her boyfriend then there may be sex or love or both. A boy can kiss his fiancee to express love or to express lust. Now we can say that kiss is not a symbol of anything but depends upon mood and time. It can be appear as symbol of sex or love or both.

Importance of Sorry and Thank You in smooth relation

friends, it's well known saying "no sorry, no thank you in friendship". but what you think? is it right? really these two words are not needed in friendship? suppose your very close friend has done something wrong with you and he doesn't realize and blaming you for this. how you feel? feel bad, no? then you only expect a word "sorry" from him/her.if he realizes and says sorry you feel ok. now what you think, is there need of "sorry". yes, ofcourse yes, but why people say "no need of sorry in friendship". same case in "Thank You" if you have done great for a friend then also you expect a word "Thank You" from him. these two words are very nice to hear. person who says like this himself expect these words from friend. it's only trend to say "there is no need of Sorry and Thank You in friendship" I think these two words can make your relationship smooth and better. use these words and make your relationship better.

What should we do to Afjal Guru and Kasab?

Now a days there are two news in air. Both are in public interest.
1. Kasab’s death penalty and
2. Afjal guru’s death penalty
Both news are same and related to national security. Our country is divided in two groups
1. Person who support death sentence and don’t want any delay
2. Who don’t want death sentence
2nd group claim themselves supporter of Human rights. In their view there should not be any death penalty in civilized society even for them who has killed innocent person. If you think like them you also support them on the matter of abolition of death penalty. Death penalty is really violation of human rights. No one can take anyone’s life. Now you can say we have right to kill the person who has killed many innocent person. But do you think they are uncivilized and we are claiming us civilized. They are killing persons in an uncivilized manner but we are killing them in civilized manner. We are killing in the name of law and order. What’s the difference between them and us?
These are the views of the persons who are opposing Death penalty. But we the people who supports Death penalty for them think different. We think if we abolish death penalty for callous persons, terrorists then they can destroy our country’s peace. I think we are right. If we forgive them may be one or two terrorist will change their heart and they become good and civilized person but most of the terrorist will emerge as a major threat to the country. The person whom we forgive he become good but many terrorist will do terror activity only because they think our government is not going to punish me. Politicians are telling about disturbance of law and order in impact of death sentence of Afjal guru. Who is going to disturb law and order for this terrorist? Definitely they are terrorist and police should handle these terrorists strictly. So I think we should not delay their death.
Thank you

“Will you marry within the same Gotra?” Naveen Jindal Grills TOI reporter

In an unexpected way Mr. Naveen Jindal, (a youth icon who has fought battle with Indian government for individual’s right to hoist our national flag) grills a reporter “will you marry within same gotra?” when reporter responded in yes, he asked “will your parents also not have any problem?”. For this question reporter responded in yes again. Mr. Naveen Jindal insisted her to call her mother and asked “if she would have a problem if she wanted to marry a boy of the same gotra?” her mother also answered , “no”.
If her mother would have replied in yes then also what should be problem to allow anyone to marry within same gotra? If I don’t want to marry within same gotra, it don’t mean I have right to oppose anyone. Who has given me the right to pronounce judgement to kill couples or boycott them? What has happened to Mr. Naveen Jindal? How can he support these “KHAPS”. Had anyone expected that from him, a person who has fought 7 yrs long battle for individual rights to hoist national flag. He became an icon for fighting for individual right and now unfortunately he is supporting an illegal Panchayat which is strongly against individual rights. What’s wrong with him? He should think.